(1)
भारत एक विकासशील देश,जहां सदियों से विकास चल तो रहा है।जो कि आगे भी निरंतर चलता ही रहेगा।इस चलते रहने का कारण हम स्वयं हैं।क्योंकि हमें "चल रहा है न"देखना और सुनना दोनों पसंद है।
सुबह के 6 बज चुके है।केरल वाली आंटी जिन्हें पूरी बिल्डिंग मद्रासन आंटी के नाम से जानती है।ये कुछ ऐसा ही है कि जो मार्किट में चल फिर उसके बाद जो भी आएगा उसी नाम से पुकारा जायेगा।
जोर से ऊपर की और मुहँ करके दहाड़ती हैं,चोटु........ चोटु...........(अपनी केरल वाली हिंदी छोटू को चोटु)
सुनो,
हम्ममम्म
अरे उठो न।
क्या है?क्या दिक्कत है संडे है आज।
अरे! मद्रासन आंटी आज फिर गला फाड़ रहीं हैं।उठो देखो क्या हुआ।
चिल्लाने दो,अभी खुद चूप हो जाएंगी।
तुम से तो कुछ बोलना ही बेकार है।
हम्ममम्मम्म
हाँ आंटी जी,क्या हुआ।
नीरा देको, आज फिर पूरा रात से तुमारा कूलर से पानी टपका मेरा कूलर पे।
टप टप का आवाज आया पूरी रात मैं सो नहीं पाया।
आंटी मैं भेजती हूँ इनको।देखेंगे आज संडे है न।
वो कूच नहीं सुनता है,चोटु हमेशा ऐसा करता है।
पिचली बार बोला ता,तो मेरा कूड़े का बाल्टी,मेरे ही कपडे की रस्सी से कूलर के नीचे बांध दिया।मैं तीन दिन तक कूड़े का बाल्टी ढूंढती रही।फिर बरसात में जब कूड़ेदान का गंदा पानी मेरा कूलर पे गिरा तो मेरे को पता चला।
मैं उसी दिन उसको बोली तो बोलता है,कोई नहीं आंटी अब तक काम चल रहा था न,कुछ और देकेंगे।
अब काम नयी चलेगा,मेरे को उसका सोल्युशन चाहिए नहीं तो तुम कूलर हटाओ।बस आज लास्ट हैं,मेरी तरफ से।
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(2)
अरे! भगवान् के लिए अब तो उठ जाओ,कुछ सुना तुमने?
हाँ,यार सुन तो लिया आज कर दुंगा।
पहले इसे अपना बाहर वाला नाम बोलना सिखाऊंगा,फिर इसका मुँह सील करूँगा और फिर कूलर का।
अरे! चुप करो,सुन लेंगी।आखिर बचपन से देख रहीं हैं तो घर वाला नाम ही लेंगी न।
अरे! तो बुढ्ढन वो भी तो ठीक से नहीं ले पाती।
चुप करो और जाओ देखो,नहीं तो तुम कल दफ्तर होंगे, और ये मुझ पर चिल्लायेंगी।
कैसे चिल्लायेंगी?
तो पक्का न कूलर की लीकेज देख लोगे न?
नहीं,इसका मुहँ सील कर दूंगा न आज ही।
तुम जाते हो की नहीं।
जा रहा हूँ,बाबा कूलर तो चला दो,
नहीं चलेगा,उठो चुप चाप से.....
(3)
टिंग तोंगग्ग्गग्ग
कौन?
आंटी मैं,सोमेश
ओह्ह चोटु।
हम्म्म्म चोटुउउउउउउ।
(बिना गेट खोले)
मैं तुमसे परेशांन हूँ,तुम सुनते क्यों नहीं?
हाँ आंटी,अब आपको दिक्कत नहीं होगी।
तुम पिचली बार भी ऐसा ही बोला ता।
नहीं आंटी इस बार दिक्कत नहीं होगा।
(सामने रोड रोलर की आवाज आ रही थी,साल में दूसरी बार सड़क बन रही थी।)
सोमेश का ध्यान आंटी की बातों पे कम और रोड से आती आवाज पर ज्यादा था।बिल्डिंग के बच्चों को आंटी की आवाज से भनक लग चुकी थी,सोमेश भैया आज शाफ़्ट एरिया में चरण रखेंगे और छत से जितनी बॉल नीचे गिरीं है उनके वापिस आने का टाइम आ गया है।
आंटी की अमर गाथा और अपने कर्मों का थोड़ा सा फल भोग कर सोमेश बाबू ऊपर आये तो देखा,आंतरिक खुरापाती मानुष को दबाये कुछ मासूम वानर,मेंन गेट पर याचक स्तिथि में खड़े हैं।
चाचू नमस्ते!
ह्म्म्म नमस्ते
आप कैसे हैं?
काम बोलो,चुप चाप से।
वो क्या है न कि, माही(सोमेश की ढाई साल की बेटी) की बॉल वहाँ कूलर के पीछे गिर गई थी।वो रो रही थी कल।
ये माही की बॉल तब ही क्यों गिरती है जब मैं शाफ़्ट में जाता हूँ और वो मुझसे तो नहीं कहती?पर व्योमु तुझ से ही सब क्यों कहते हैं।कि उनका कोई सामान वहां गिरा है।तू बिल्डिंग का मुखिया है क्या?
नहीं,वो सब डरते हैं न आपसे।
अच्छा और तुझे डर नहीं लगता?
नहीं ऐसा नहीं है,वो मैं तो आपका सबसे ज्यादा सम्मान करता हूँ न।
(इस राजनितिक उत्तर के बाद कुछ शेष नहीं बचता था)
ह्म्म्म वो तो है।
(4)
सोमेश महाशय,लीकेज रोकने के सारे हतकंडे आजमा चुके थे,पर सासु माँ के प्यार से दिए कूलर का मोह छूट ही नही रहा था।आखिरकार,आज कुछ तो उपाय सोचना था।बुड्डन के प्रकोप से बचा जा सकता था,परन्तु गृह मंत्रालय से शाम को आते ही कारण बताओ नोटिस मिल सकता था।फिर से सड़क कार्य की आवाज कानों में गूंजी और बचपन की दादी माँ का जुगाड़ दिमाग में आ गया।
बचपन में दादी माँ गेंहू पछोरने वाले तीलियों से बने सूप में छोटे मोटे गैप को गर्म डामर से भर देती थी।माथा ठनका और महाशय जी तुरंत उठे,अधूरी बनी सड़क की और कूंच किया।वहां मजदूर खाना खाने के एक पेड़ के नीचे बैठे थे।महाप्रभु ने बिना किसी से पूछे, एक ड्रम से बहते थोड़े से गर्म डामर को एक पतरे के हिस्से पर जमा कर लिया और बुड्डन के घर की तरफ कूंच किया।चाल में आत्मविश्वास जोरों पर था।बड़ी ही तेजी से सवारी उनके गेट पर आके रुकी और बेल को इस तरह बजाया गया जैसे ट्रैन कूलर के नीचे से ही पकड़नी है।
अंदर से आवाज आई,कौन!
मैं आंटी, सोमेश।
ओह्ह चोटु!
(खिसियाई आवाज में धीरे से)
हाँ हाँ बुड्डन चोटूउउउउउ,पूरी दुनिया सिख जायेगी ये बुढ़िया नहीं सीखेगी।
(जोर से)
हाँ आंटी मैं ही हूँ।
(गेट पर आके)
इतना तेज बेल क्यों बजाया, आ रहीं थी न,बहरी नहीं मैं।
गुस्से की इतनी हिम्मत!जो आपके चेहरे पर आया?मैंने तो आज सुबह ही आपकी व्यवहार कुशलता के बारे में दो लोगों को बात करते सुना।
तुम हर बार ऐसा बात करके मेरे को बेवकूफ बनाता है,पर इस बार नहीं चलेगा।
क्या आंटी आपको भी अपनी तारीफ़ पसंद नहीं है।यही बात आपको सब से अलग करती है।
चोटु,बकवास बंद......लीकेज का क्या सोचा।
आंटी,अब चिंता मत करो।ऐसा इलाज सोचा है कि सालों की छुट्टी।
जल्दी करो,मेरे को जाना है कहीं।
बस अभी लो।
(आंटी के घर से होते हुए,शाफ़्ट एरिया की तरफ महाशय जी बढे ही थे कि ऊपर छत से याचना भरी आवाज़ आयी)
चाचा वो बॉल भी निकाल देना।
निकाल दूंगा,पहले इस मुसीबत से तो निपटने दे।
चोटु,तुमने कुछ कहा क्या?
नहीं आंटी,वो व्योमु से बात कर रहा था।
(आखिरकार सफ़ेद कूलर को कई जगह से श्याम वर्ण से रंजीत कर उसकी वेशभूषा ही बदल दी गयी।)
बीवी के सामने महाशय जी कॉलर ऊपर करते हुए घर में घुसे,जैसे सारागढ़ी की लड़ाई में सबको मार कर वही अंतिम बचे थे।
कुछ दिन के लिए शांति का वातावरण व्याप्त हो गया।जहाँ रोज आंटी से सुबह निकलते वक़्त मुँह छुपाया जाता था।अब उनका हाल चाल पूछे बिना नहीं निकलते बनता।
आसमान साफ था,तेज धूप ने नाक में दम कर दिया था।आंटी जी कूकरी शो की पक्की फैन थी।पता नहीं कब से अचार डालने का प्लान बनाये बैठी थी।धुप देख कर अचार डालने का निर्णय ले ही लिया।अब जब कच्ची अम्बिया सुखाने के बाद मिश्रण तैयार कर के उसे ठीक कूलर के नीचे आती धुप के नीचे दिया।वहां बंदर और बच्चों से सुरक्षा निश्चित थी।रविवार का दिन था।सामान्य दिन की तरह ही अचार को निश्चित जगह पर इस बार दक्कन खोल के रखा गया पर इस बार होनी को कुछ और ही मंजूर था।धुप ने डामर को कुछ लिस लिसा सा कर दिया था।बची खुची कसर सामने वाले खिड़की के टूटे शीशे की चौंध ने पूरी कर दी।
स्वादिष्ट अचार का मसालेदार रंग काला पड़ने लगा।
शाम हो चुकी थी,सोमेश बाबू ने चाय की बांग लगायी ही थी, अंगड़ाई लेते हुए कि नीचे से एक जोर से कर्कश भरी आवाज़ आयी।
चोटु उउउउउउउउउउ..............................।