बेकार जवानी
तो छुप के पीना बैमानी है।
और फेफड़े फूंकना ही ट्रेंड है।
तो निरी बेकार ऐसी जवानी है।
दौलत की दौड़ में हो अंधी,
जिसे दिखावे की बीमारी है।
अन्याय पर आवाज हो मंदी,
निरी बेकार ऐसी जवानी है।
अरे ओस चख कर तो देखो।
ये नहीं मुफ्त का पानी है।
बरसात में जो नहीं भीगी।
निरी बेकार वो जवानी है।
पहाड़ों की और चल निकलो,
देखो कुदरत कितनी रूमानी है।
मोबाइल में जो गुम हो चुकी,
निरी बेकार ऐसी जवानी है।
किताबों से इश्क कर लो,
मिट जायेगी,जो बेताबी है।
सीरत छोड़,सूरत पर मरती हो,
निरी बेकार वो जवानी है।
नदियों के सहारे बहो तुम,
देखो दरिया में कितनी दीवानगी है।
दुनियादारी में हो जाए गुम,
निरी बेकार वो जवानी है।
ख़ून न खोलता हो जिसका,
जिसे डरने की बीमारी है।
खून,पसीना न हुआ एक जिसका,
निरी बेकार वो जवानी है।
निरी बेकार वो जवानी है।