बुधवार, 21 अगस्त 2024

बेकार जवानी

 बेकार जवानी

अगर धुम्रपान सही है।
तो छुप के पीना बैमानी है।
और फेफड़े फूंकना ही ट्रेंड है।
तो निरी बेकार ऐसी जवानी है।

दौलत की दौड़ में हो अंधी,
जिसे दिखावे की बीमारी है।
अन्याय पर आवाज हो मंदी,
निरी बेकार ऐसी जवानी है।

अरे ओस चख कर तो देखो।
ये नहीं मुफ्त का पानी है।
बरसात में जो नहीं भीगी।
निरी बेकार वो जवानी है।

पहाड़ों की और चल निकलो,
देखो कुदरत कितनी रूमानी है।
मोबाइल में जो गुम हो चुकी,
निरी बेकार ऐसी जवानी है।

किताबों से इश्क कर लो,
मिट जायेगी,जो बेताबी है।
सीरत छोड़,सूरत पर मरती हो,
निरी बेकार वो जवानी है।

नदियों के सहारे बहो तुम,
देखो दरिया में कितनी दीवानगी है।
दुनियादारी में हो जाए गुम,
निरी बेकार वो जवानी है।

ख़ून न खोलता हो जिसका,
जिसे डरने की बीमारी है।
खून,पसीना न हुआ एक जिसका,
निरी बेकार वो जवानी है।

निरी बेकार वो जवानी है।






मंगलवार, 12 सितंबर 2023

मेरी जान

बात कुछ खास बड़ी नहीं होती है।
रूह मेरी दूर खामोश खड़ी होती है।
हर खता मेरी आंखों में पढ़ लेती है।
वो बढ़ी आंखों से मेरी खबर लेती है।

आंखों में उसकी रंगीनियत ऐसी कि,
उसके आगे सारे नगीने फीके पड़ जाएं।
उसके चेहरे में है मासूमियत ऐसी कि,
दुनिया जहां के फरिश्ते भी पीछे पड़ जाएं।

मेरी गलतियों पर चुप रहती है।
उसके आंसुओं से तड़प जाता हूँ।
मुझसे कहीं बोलना बंद न कर दे।
मैं ये सोच कर भी घबरा जाता हूँ।

आंखें उसकी अलख जगा देती है।
मुझे जीने की वजह बता देती है।
मैं जब कभी वादे तोड़ देता हूँ।
प्यार भरे ताने दे के सजा देती है।

मैं थोड़ा बदमिजाज बेअदब हूँ।
वो बड़ी खुशमिजाज बाअदब है।
मैं उसकी मोहब्बत से भरा पड़ा हूँ।
पर वो मेरी मोहब्बत से लबा लब है।


शुक्रवार, 3 मार्च 2023

सरहज संग फगुआ

दईद सार के खलमुसर,सिल बट्टा,
पिसञs माल़ मसाला, भांगे क पत्ता,
चलs दुनऊ संघवा खेली फगुआ,
ए काल कचरहीं कुल कपड़ा लत्ता।

बता द मसाला तेल कहा बा,
न मिल्ई त, खोजञ का कहा बा 
आव तू हम खेली फगुआ,
बिसर जाई आज, के कहां बा।

ए तलई समोसा, कचरी,भजिया,
तू रसभंगा संघे ल नमकिनिया,
आव होई जाए खेल खेलनिया,
तोहईय लगाई अबीर बुकनिया।

सरऊ से घोंटवायी भंगिया,
फिर पिसवाई चटनी धनिया,
दे दना दन तू हम खेली फगुआ
छानी रसभंगा, चाट चटनियां।

अउर ऐ करेजा, तोहई बदे बा!

सुतारे लगवा ल रंग रंगनिया,
ढेर जिन नाच! नाच नचनिया,
ना त मुर्चा जाई कमर कलईयां,
हम बनी फगुआ, तू बनs फगुनिया।














शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

Ae Rahi

Ae Raahi tu jab chale Sadak par,
Dost milenge tujhe har pag par,
Na ummidi ka bojh rakh jami par,
Tu bas aitbaar kar har dost par.

Ae Raahi tu jab chale sadak par,
Milna Bichadna dastoor tera,
Aansoo poch dekh Dagar par,
Kismat fir milayegi sabse Manjil par,

Ae Raahi tu chale jab sadak par,
Jab kabhi ladkhadaye,
Na tike haath jab kisi Hum safar par,
Utha khada ho dekh Falak par,

Uthna hai tujhe Uss  se bhi upar, 
yehi mukaam rakh Jahan me,

Ae Raahi jab tu chale Sadak par....

DEDICATED TO ALL MY BEST BUDDIES 

#TJ

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

पत्नी परम धर्म

पत्नी परम धर्म
विवाह उपरांत मुझे आत्मज्ञान हुआ,
नेत्र खुल गए मेरे, मार्ग मेरा परमार्थ हुआ।
जब हुए तुम्हारे रौद्र विकट रूप के दर्शन।
तब जाके मेरा सौभाग्य चरितार्थ हुआ।

जीवन मे निकटता ज्यों ज्यों बढ़ी,
मेरी तो विकटता भी त्यों त्यों बढ़ी।
हे प्रिये, तुम अद्भुत हो, अद्वितीय हो,
तुमसे कैसा तर्क? तुम अविजित हो।

तुम अति गुणवती, बलवान हो।
सारी कलाएं तुमसे विद्यमान हैं।
मेरी विधि तुम, तुम ही विधान हो।
मेरा तुम्हें शास्टांग प्रणाम है।

हे प्रिये, तुम जितनी सुंदर हो।
ठीक उतना ही मैं बुद्धिमान हूँ।
विवाह उपरांत सत्य विदित हुआ।
तुम ही अतिकुशल सर्व शक्तिमान हो।



बुधवार, 7 सितंबर 2022

मानस उद्भव

महापिंडो का महापिण्डों से मर्दन,
ब्रह्मांड ने किया विनाशकारी कृन्दन।
महाप्रलयंकारी महाविस्फोट हुआ,
तब जाके सौर मंडल प्रस्फ़ुट हुआ।

सूर्य का प्रज्वलन, नवग्रह संस्कार हुआ।
मात्र पृथ्वी पर पंचतत्व का उद्गार हुआ।
प्राकृतिक साम्य से वातावरण हुआ प्रणीत,
धरती माँ का जीवन स्वप्न साकार हुआ।

जल से थल पर, थल से नभ पर,
जीवन का उद्भव फिर प्रचार हुआ।
विकसित हुए जीव जंतु और मानव,
जीवन से ही जीवन का प्रसार हुआ।

प्रकृति की विकास लीला भी परम् है।
सभी जीवों की श्रंखला में मानव चरम है।
बाकी जीवों का विकास ही सीमांत है।
जीवों में मात्र मानव की सीमा अनन्त है।












शनिवार, 18 जून 2022

नई दिल्ली में मिली थी

ये प्यार था, दो दिलों की हेरा फेरी थी।
ट्रेन की पों पों,भीड़ की जोराजोरी थी।
याद करो जब नई दिल्ली में मिली थीं।
न मैंने सुन न चाहा,न तुम कुछ कह रही थीं।

आलू पूरी की,तो समोसे की गरमाहट थी।
भरी गर्मी में भी दो दिलों में सरसराहट थी।
था तुमसे मिलना शुद्ध प्रचुर नई दिल्ली में।
भले खाने के हर सामान में मिलावट थी।

वेटिंग टिकट थे,हमें सीट की थी कहाँ फिकर।
मेरे दिल में दिमाग में था बस तुम्हारा जिकर।
याद करो जब तुम हमसे नई दिल्ली में मिलीं थीं।
जब अनजान नजरें एक दूसरे को देख फिसलीं थी।।

ऊपर वाले ने भी क्या चुन कर हमें मिलवाया था।
न तुम कुछ कह पाई थीं,न मैं कुछ सुन पाया था।
क्या बेहतरीन जोड़ी नई दिल्ली स्टेशन में मिली थी।
तुम बेचारी गूंगी थी, मेरे कानों पर सुना साया था।