बुधवार, 6 जनवरी 2021

अल्प विरह (शादी के बाद)

जाती हो जब कभी पीहर तुम,
कुछ दिन सब अच्छा लगता है।
पर जब तुम नहीं होती हो घर में,
तो मुझे घर,घर सा नहीं लगता है।

मेरे सपने,मेरे अरमान,मेरे मज़ाक़,
सब कुछ अधूरा लगने लगता है।
चली जाती हो जब छोड़ कर मुझे,
अपना घर पराया लगने लगता है।

हफ़्ते भर में सब बेस्वाद लगता है,
तुम बिन घर भी होटल लगता है।
अकेले रहने का मन तो करता है।
पर अब यही अकेलापन खटकता है।

छोटी चिड़िया भी है मेरे घरोंदे की,
जिससे मेरा घर संसार महकता है।
चली जाती है जब तुम्हारे साथ वो,
चौखट और आंगन नहीं चहकता है।

बाबुल की चाहत को समझता हूँ,
वियोग की दुविधा भी समझता हूँ।
बाबुल से विरह की व्याकुलता समझता हूँ।
तुम्हारे हृदय के एक कोने में,मैं भी बसता हूँ।

मेरे घर आंगन में पायल फिर से झनका दो,
मेरे बगिया को पहले जैसा ही महका दो।
जैसा था मेरा जीवन,पहले जैसा ही बना दो,
अब आ भी जाओ,घर को फिर से घर बना दो।

कृति रचनाकार: नितेश तिवारी