जाती हो जब कभी माईके तुम,
कुछ दिन सब अच्छा लगता है।
पर जब तुम नहीं होती हो घर में,
तो मुझे घर,घर सा नहीं लगता है।
मेरे सपने,मेरे अरमान,मेरे मज़ाक़,
सब कुछ अधूरा लगने लगता है।
चली जाती हो जब छोड़ कर मुझे,
अपना घर पराया लगने लगता है।
जाने के हफ़्ते भर बाद सब बेस्वाद लगता है,
जिस घर में रहता हूँ,यही होटल लगता है।
रहती हो,तो अकेले रहने का मन करता है।
पर अब यही अकेलापन खटकने लगता है।
एक छोटी चिड़िया भी है मेरे घरोंदे की,
जिससे मेरा घर संसार सब महकता है।
चली जाती है जब तुम्हारे साथ वो भी,
मेरी चौखट मेरा आंगन नहीं चहकता है।
तुम्हारी बाबुल की चाहत को समझता हूँ,
मुझसे वियोग की दुविधा भी समझता हूँ।
बाबुल से विरह की व्याकुलता समझता हूँ।
तुम्हारे हृदय के एक कोने में,मैं भी बसता हूँ।
मेरे घर आंगन में पायल फिर से झनका दो,
मेरे बगिया को पहले जैसा ही महका दो।
जैसा था मेरा जीवन,पहले जैसा ही बना दो,
अब आ भी जाओ,घर को फिर से घर बना दो।
कृति रचनाकार: नितेश तिवारी