लबों पे आग,आंखों खून होना चाहिए,
हमे वो दहाड़,अब वो ललकार चाहिए,
अब अंगारो के सेज से भी न डरे जो।
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।
कलम चले तो,अक्षरों में धार चाहिए,
प्रहार से दोफाड़ हों,वो घाव चाहिए,
इंक़लाबी कलम इतनी धारदार चाहिए,
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।
(नितेश तिवारी)
सियासतों की सियासती से रुकसती,
सियासत का नंगा खेल नहीं चाहिए।
नकेल कसे जो चाल चले सियासती,
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।
(नितेश तिवारी)
जन से,जन का,जन को राज चाहिए,
तपिश,वो तपन,वो आवाज़ चाहिए,
खून में रवानगी,वो रफ्तार चाहिए।
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।
नितेश तिवारी