गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

चीख

शशांक सिंह राजपूत को समर्पित कविता।



कहीं खुद से बोलना,भूल तो नहीं गया!
जबकि औरों से बात करता नहीं।
अगर चीख दूँ,जोर से अकेले में कहीं,
पता नहीं क्यों,खुद को ही सुनता नहीं।

मैं घुल रहा किसी कश्मकश में अंदर कहीं,
मैं कौन हूँ?समझ पा रहा हूँ या नहीं?
जैसे शक्कर घुल जाती हो पानी में,
क्या था मैं पानी?या अब शक्कर तो नहीं?

चीखना चाहता तो हूँ,मैं बहुत जोर से
चिल्लाना चाहता हूँ ,बहुत जोर से
पर लगता है,मैं अंदर ही जप्त तो नहीं?
मैं आहत हूँ,गुम हो चुकी आहट से कहीं,
लगता है,अपने अंदर ही मैं दफ़्न तो नहीं?

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