सर पर सूरज,तलवों तपती धरती,
मां मुझसे और सहा नहीं जाता।
मां अब और चला नहीं जाता।
आज कंधों पर थैले,सर पर भारी गठरी,
गांव में था घमंड दिखाता,लड़का हूँ मैं शहरी।
हाड़ों पर गृहस्थी का बोझ देखा नहीं जाता।
तेरे दुःख से व्यथित,मुझसे चला नहीं जाता।
खून खौल उठता है माँ मेरा,
रगों में बहता खून लगता पानी,
जब जब मुझको है दिखता,
खून पसीना, छालों से बहता पानी।
तेरा साहस, देख ताक़त आ जाती है,
तेरी सांसों में,मेरी सांसों की गिनती हो जाती है।
चलेगी जब जहाँ तक,मैं चलूंगा
माँ तेरा बलिदान न भूलूंगा।
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