सोमवार, 26 अप्रैल 2021

नीरो की बांसुरी

सांस लेने के लिए सांस कम पड़ गई,
नौजवानों तक की धड़कने थम गई।
वो बीच बीच मे जिक्र तो करता रहा,
पर नीरो गद्दी की फिक्र करता रहा।

मरघटों में लकड़ियां कम पड़ गई।
शव जलाने को जमीन कम पड़ गई।
वेदनाओं का ज्वालामुखी फटता रहा।
नीरो बातें इधर उधर की करता रहा।

धरती का सीना अर्थियों से लद गया,
प्रचण्ड अग्नि चिताओं से तप गया।
घाटों पर मौतों का मेला लग गया।
प्यारा नीरो जा कर मंच पर चढ़ गया।

कुछ तो मरे, कुछ को डर सताता रहा,
मृत्यु दानव सड़कों पर तांडव मचाता रहा,
काल एक एक कर सबको खाता रहा।
नीरो मौत की धुन बांसुरी पर बजाता रहा।

(जरूरी नहीं किसने लिखा है,जरूरी ये है कि क्यों और किसके लिए लिखा है।अपना नीरो आप चुनिए मैंने चुन लिया है।)

मुखौटा

डरता हूँ कहीं अपनों से पराया न हो जाऊं।
मैं बेबाक नहीं रहा,जो हर बात कह सकूँ।
डर जाता हूँ,जो अपनों से सताया जाऊं।
आईना नहीं,जो हर बात सच कह सकूँ।

किसी की कसौटी पर क्या परख करूँ?
अब तो खुद को परखना भूल गया हूँ।
अब मैं मेरे पैमानों का भी क्या करूँ?
एक ऐसे सांचे में ढाल दिया गया हूँ।

मैंने तो कब का सोचना ही छोड़ दिया हैं,
पर सोचने का नाटक अच्छा निभा लेता हूँ।
सब निजी उपज की राय पे चलते हैं।
उनकी उपज में कुछ अपना उपजा लेता हूँ।

जब देखता हूँ,अपनी ही गाने वालों को।
खुद तर्क और आंकड़ों को जला देता हूँ।
प्रणाम कर लेता हूँ,नौनिहाल ज्ञानियों को।
अपने अर्जित ज्ञान को स्वाहा कर देता हूँ।

चाभी गुमा चुका हूँ,खुली सोच की दूर कहीं।
तुम खुली बात करना,दबी सोच की हर कहीं।
मुझे खोजना हो,तो मिलुंगा अंधेरों में कहीं।
गलती से खोजने,मत लगना उजालों में कहीं।
नितेश तिवारी "रचनाकर"

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

नाटक : इब्लीस का जनाज़ा

       नाटक-इबलीस का जनाज़ा
पात्र:
1) इबलीस - मृत शरीर
2) वक्ता- सूत्रधार
3) कल्लू- हज्जाम
4) टांडे मियां - इबलीस के मित्र
5) चंदौसी बीबी - लखनऊ की रसूकदार महिला,इबलीस की पड़ोसन
6) मुख्तार : मुखिया,सरपंच
7) रक़ीब : चाय की दुकान वाले
8) साक़ी : मोहल्ले के जाने माने बीड़ी बाज
9) मंजूर : गांव का अन्य व्यक्ति
10) अनवरी और सरवरी -  चन्दौसी बीबी की चमचियाँ

प्रोप : 
रिकॉर्डिंग्स :1) बच्चे के रोने की आवाज़
2)घोड़ों और बन्दूकों की आवाज़
3) खपड़े के छत गिरने की आवाज़
4) नेता जी जिंदाबाद के नारे
5) आग लगने,भगदड़ की आवाज़
6) धरती फटने की आवाज़
7)भूकम्प में घर गिरने की आवाजें
कपड़े: 
1) बुर्के - 2
2) लेडीज सूट -1
3) टोपी और पठानी कुर्ता पजामा 
4) मुख्तार भाई : पटवारी सूट या कुर्ता पैजामा
मेकअप : सबने गहरा सुरमा लगाया हो।




वक्ता : इबलीस मिया के पैदा होते ही उनका रोना सुन कर दाई मां को मिर्गी का दौरा पड़ गया था।ये जिस रात पैदा हुए थे।उसी रात गांव में डकैती पड़ गयी थी।डाकू पूरे गांव को नंगा कर गए थे।इबलीस मियां के अम्मी और अब्बू पर छत गिर गयी थी और वो एक दूसरे को प्यारे तो थे ही ऊपर वाले को भी प्यारे हो गए।।गांव में जब पहली बार नेता आये थे तो लोगों को लगा बरक्कत होगी पर इबलीस मियां की बीड़ी को कहाँ गवाँरा था।कलमुँही ने नेता जी का स्टेज ही फूंक दिया।इबलीस मियां का दुर्भाग्य कहें या कुछ उनके कारनामें की,उनके गांव का हर आदमी 20 गज का फासला बना के रखता था।कुछ दिखने में तो थे ही अमावस के चांद जैसे।ऊपर से जुबान काली थी।गांव में सबसे उधार ले रखा था।
इबलीस मियां जीते जी किसी के प्यारे नहीं हो सके पर आखिरकार ऊपर वाले को प्यारे हो गये हैं।उनकी मनहूसियत इस कदर लोगों के सर चढ़ कर बोलती थी कि,अब आगे पीछे किसी के न होने की वजह से ज़नाज़े को ले जाने के लिए भी कोई आगे नहीं आ रहा है।
उनके प्रिय मित्र टांडे मियां जो कि इबलीस मियां की यारी के चक्कर में अपनी एक टांग गंवा चुके थे। ठहरे करारे मित्र ।अंतिम समय तक साथ नहीं छोड़ना चाहते थे।
           (1)
टांडे मियां: (रोते हुए)हाय मेरा हमदम मेरा दोस्त।मुझे छोड़ गया।अब मेरा निकाह कौन करायेगा?या ऊपर वाले ये कैसा जुल्म किया?मेरे दोस्त ने वादा अधूरा छोड़ दिया।
चंदौसी बी: अरे रो मत टांडे,बेचारा बहुत अच्छा आदमी था।रूह को जन्नत बक़्शे ऊपरवाला।
कल्लु: क्या चंदौसी बी जिंदा था,तो पेट भर के गाली देती थीं।आज अच्छा आदमी कहती हो।
चंदौसी बी:(आंखे तरेरते हुए)कल्लू! पेट तो मेरा अभी भी भरा हुआ है,तू कहे तो खाली कर दूँ ?
कल्लू: बी तुम गुस्सा हो जाती हो।तुम तो जानती ही हो मेरी जुबान फिसल जाती है।
चन्दौसी बी: दोबारा न फिसले! नहीं तो दुकान के किराए का तगादा बाकी है।
कल्लू : क्या बी ऐसे गमगीन मोके पर आप भी न,तौबा तौबा !
टांडे मियां : हाय मेरा लंगोटिया यार! पूरे गांव को अकेला छोड़ गया।
कल्लू : इसी में तेरी और पूरे गांव की भलाई थी।
(2)
मुख्तार : अरे! ज़नाज़े की तैयारी करो।चार आदमी आगे आओ।
कल्लू : चार आदमी! वही चार आदमी जो देखेंगे तो न जाने क्या क्या कहेगें?
मुख्तार : नहीं वो चार नहीं,उनकी खोज तो मैं खुद पैदाइश से कर रहा हूँ।अभी तक तो मिले नहीं।पर कल्लू ज़ुबान को सीधा भी रखा जा सकता है।
कल्लू : बड़े मियां आप ही ने चार आदमी बुलाये थे,तो उनके बारे में बताना तो बनता है।
मुख़्तार : क्यों रक़ीब भाई आपकी दुकान पर तो उठना बैठना था।आप तो आगे आएं।
रक़ीब : क्या ख़ाक आगे आएं,उधारी भी ले बढ़े मियां।
साक़ी : (बीड़ी का गश मुट्ठी से खींचते हुए)क्या मियां उधार वो भी तुमसे? बड़े हरफनमौला निकले इबलीस भाई।
रक़ीब : साक़ी तुझे बड़ी खुशी है!मेरा उधार मरने की?
साक़ी : (बीड़ी की राख चुटकी से झाड़ते हुए,रक़ीब की तरफ इशारा करते हुए)जो शक़्स अपना पसीना भी अपने पौधों पर छिड़के,उस से तो उधार लेना फन ही माना जायेगा।
रक़ीब : (साक़ी पर झपटते हुए)मुख़्तार मियां समझा लो साक़ी को, नहीं तो!
मुख़्तार : (बीच बचाव करवाते हुए)
साक़ी : (पतले हड्डल शरीर को कंपकंपाते हुए,बीड़ी पैरों से कुचलते हुए)नहीं तो क्या?जवानी में तेरे वजन के तो मुगदल घुमाये हैं मैंने।
चंदौसी बी : उधार तो मेरा भी था।पूरे 50 हजार।
गांव के और भी बोलते है,मेरा भी था,मेरा भी था।
(3)
मुख़्तार : अरे! ऊपर वाले से तो डरो।चुप करो तुम लोग।
चंदौसी बी : अरे कोई तो आगे आओ,ये क्या यहीं रखा रहेगा?(नाक सिकोड़ते हुए)
टांडे मियां : कोई आगे आये न आये मैं कंधा दूंगा मेरे दोस्त को।
कल्लू : वो तो ठीक है,टांडे मियां पर तुम्हारे कंधे पर कोई रखे तो सही।
टांडे मियां : हाय मेरा हमराही।खूद भी कुंवारा रह गया,मुझे भी कुंवारा छोड़ गया।अब लखनऊ की लड़कियों का क्या होगा?
कल्लू : जैसे इनके पीछे सारी बावली थीं।
चंदौसी बी : (पान दान से पान मुँह में दबाते हुए)मुख़्तार भाईजान सारा दारोमदार आप पर है,आप ही फैसला करो।
मुख़्तार : अपनी गांव में चुनाव होते ही आएं है,तो फैसला भी ऐसे ही हो।टांडे मियां राजी हैं।मुझे भी राजी होना ही पड़ेगा।बाकी आप लोग आपस में सलाह मशविरा करें।
कल्लू : सोच लो मुख्तार भाई जान आपको चुनाव जीताने का जिम्मा इबलीस भाई जान ने अपने कंधों पर लिया था।उस साल जमानत भी जब्त हो गयी थी आपकी।
और टांडे मियां तो बेकार ही एहसानों में दबे हैं।नहीं तो वो भी कौन सा तीन कोस तक उठा लेंगे?
मुख़्तार : (अजीब दुविधा में फंसते देख)कल्लू कह तो सही रहा है।
चंदौसी बी : अरे मुआ क्या ख़ाक ठीक कह रहा है?इस कलमुहे का बस चले तो ये पूरे लखनऊ में किसी की मय्यियत न उठने दे।
कल्लू : नहीं बी,आपको मैं सबसे पहले उठाऊंगा।
चंदौसी बी : हा हा मार दे मुझे,ताकि 6 महीने का किराया भी न देना पड़े।
कल्लू : क्या बी बात बात में तगादा करती हो।ये महामारी न होती तो वो भी दे देता।
चंदौसी बी : हां हां महामारी,जैसे तेरे यहां वैसे बड़ी लाइन लगती थी न ग्राहकों की।
कल्लू : क्यों भीड़ लगती नहीं थी।
चन्दौसी बी : हां लगती थी जब इंडिया पाकिस्तान का मैच होता था।
साक़ी : ये सब बातें छोड़ो।काम की बात करो।
अरे! जवानी में तो मैंने.....
कल्लू : (बात काटते हुए) हां हां पता है।साक़ी मियां तुमने जमाने भर की मय्यितें उठायी हैं।
साक़ी : अरे नहीं,मेरा मतलब......
रक़ीब : अरे जल्दी करों फैसला।
साक़ी : हां हां धंधे का टाइम जो हो रहा है।
रक़ीब : आंखे दिखाते हुए।
(4)
मुख़्तार : चुप करों, तुम लोग।अच्छा पर्ची ही डाल लो कम्बख्तों।
कल्लू : हां ये हुई न बात।इसलिए हर बार मैं मुख्तार भाई जान को वोट डालता हूँ।
रक़ीब : हाँ बिल्कुल मैं भी.......
साक़ी :  (रक़ीब की बात काटते हुए) हम्म तभी तो जमानत जब्त हो जाती है।
मुख़्तार : कल्लू बना पर्ची सब के नाम की।
चन्दौसी बी : आ हा हा ये मुआ अपना ही नाम नहीं डालेगा देखना।
कल्लू : (दांत निपोरते हुए),कैसी बात करती हो बी!
चन्दौसी बी : मैं पर्ची डालूंगी।
मुख्तार : ठीक है,मंजूर 
रक़ीब : मंजूर
साक़ी : मंजूर
टांडे मियां : मंजूर 
मुख्तार : (कल्लू की तरफ)कल्लू मंजूर?
कल्लू : मंजूर,मंजूर
मंजूर : हा आया! हां जी बोलो!
साक़ी : क्या बोलो?
मंजूर : जिस काम के लिए बुलाया है,वो बोलो।
मुख़्तार : अरे!तुझे किसने बुलाया?और तू हैं कौन?
मंजूर : जी हुजूर मैं मंजूर!
मुख्तार : अरे हमने तो हामी भरी थी।
कल्लू : तो क्या हुआ,आ ही गया है तो इसका नाम भी डलेगा।
मंजूर : नहीं!!!!!!!
सभी एक आवाज़ मे हां !!!!!!!!!!
(5)
चन्दौसी बी ने पर्ची बनाई।और ऊपर हवा में मुट्ठी ऊपर करके कलमा पढ़ा और जैसे ही हाथ हिलाया!जमीन जोर से हीली....
रक़ीब : साक़ी को पकड़ के अरे ये क्या ?कुछ महसूस हुआ ।
सभी एक आवाज़ में हाँ हुआ।
कल्लू : चन्दौसी बी! पर्ची फेंको।लेकिन अब की हिलाना मत।
चन्दौसी बी : ठीक है! कल्लू
अब जैसे ही पर्चियां जमीन पे गिरी,जमीन हिलने लगी।
टांडे मियां : (सबसे पहले भागते हुए)भागो जलजला आ गया।
कल्लू : भागो भूचाल।
भगदड़ मच जाती है,जमीन फटने की आवाज़।इबलीस भाई वहीं ज़मीन दोज हो जाते हैं।पूरा गांव तहस नहस तबाही।
कुछ मिनेट का सन्नाटा,लोग वापसी आते हैं।
मुख़्तार : बाप रे इतनी तबाही!ऐसा जलजला नहीं देखा।
कल्लू : हाय !(चन्दौसी बी को गिरा देख कर!)
 हाय! चन्दौसी बी हमें रोता बिलखता छोड़ गयीं।अब ये कल्लू किराया किसको देगा?
चन्दौसी बी : ( किराया सुन कर)किराया ! ला दे।
साक़ी : (चौंकते हुए) बुड्डन किराया सुन के जिंदा हो गयी।
कल्लू : (बात घूमाते हुए) अरे! ऊपरवाले ने मेरी सुन ली।
चन्दौसी बी : कलमुहे मुझे पता था।तू मरने पर भी किराया नहीं देगा।
रक़ीब मियां : अरे पर इबलीस की बॉडी कहां हैं?
साक़ी : क्यों बे उस से भी तगादा करेगा क्या?
कल्लू : अरे ! धरती में समा गई।
मुख़्तार : वाह ! रे इबलीस तेरा जनाज़ा,
            जीते जी न जीने दिया।
            मरते हुए भी सबकों ले बढ़ा।

बुधवार, 6 जनवरी 2021

अल्प विरह (शादी के बाद)

जाती हो जब कभी पीहर तुम,
कुछ दिन सब अच्छा लगता है।
पर जब तुम नहीं होती हो घर में,
तो मुझे घर,घर सा नहीं लगता है।

मेरे सपने,मेरे अरमान,मेरे मज़ाक़,
सब कुछ अधूरा लगने लगता है।
चली जाती हो जब छोड़ कर मुझे,
अपना घर पराया लगने लगता है।

हफ़्ते भर में सब बेस्वाद लगता है,
तुम बिन घर भी होटल लगता है।
अकेले रहने का मन तो करता है।
पर अब यही अकेलापन खटकता है।

छोटी चिड़िया भी है मेरे घरोंदे की,
जिससे मेरा घर संसार महकता है।
चली जाती है जब तुम्हारे साथ वो,
चौखट और आंगन नहीं चहकता है।

बाबुल की चाहत को समझता हूँ,
वियोग की दुविधा भी समझता हूँ।
बाबुल से विरह की व्याकुलता समझता हूँ।
तुम्हारे हृदय के एक कोने में,मैं भी बसता हूँ।

मेरे घर आंगन में पायल फिर से झनका दो,
मेरे बगिया को पहले जैसा ही महका दो।
जैसा था मेरा जीवन,पहले जैसा ही बना दो,
अब आ भी जाओ,घर को फिर से घर बना दो।

कृति रचनाकार: नितेश तिवारी

रविवार, 13 सितंबर 2020

याद रखना

गहरी जान पहचान है आपसे,
खूद से दुर न समझने लगना।
कहीं दूर थोड़े ही गए है आपसे,
हमे अपनी यादों में याद रखना।

बनाये रखना ये खुशनुमा फितरत,
जहन में हमारा भी ख्याल रखना,
मिले नाती-पोतों से थोड़ी फुरसत,
तो हम लोगों को भी याद करना।

जब मांगों कुछ भगवान से,
भुला न देना हमे भूल से,
अपना खूब ख्याल तो रखना,
पर हमे दुआओं में याद रखना।






बुधवार, 24 जून 2020

मुफ्त का ज्ञान

ये जो तुम लडकियों के नार्मल से नार्मल पोस्ट पर भी वाहवाही करते हो न, शास्त्रों में ऐसे लोगों को ही "पिस्सू" कहा गया है।
 

ये जो तुम बचपन में साईकिल के पिछली पहिये का चैन उतर जाने पर उल्टा पैडल मारकर चैन चढ़ा देते थे, शास्त्रों में इसी को “टेलेंट” कहते हैं!
 

ये जो तुम पूरा ध्यान लगाकर पीछे के दांत में फंसे आम के रेशे निकाल लेते हो, शास्त्रों में इसी को “लगन” बताया गया है!
 

ये जो तुम बीवी के साथ होते हुए भी सामने से आती कन्या का कनखियों से स्कैन निकाल लेते जो, इसी गुण को शास्त्रों में “चपलता” कहा गया है!
 

ये जो आप 20 की सब्जी में भी लड़-भिड़ के मुफ्त की मिर्ची और धनिया ले आती हैं, इसी को सभी शास्त्रों में “धर्म की जीत” बताया गया है!
 

ये जो तुम नींद का बहाना बना के रूमपार्टनर और उसके गर्लफ्रेंड की बात रात भर सुनते रहते हो,
शास्त्रों में ऐसे ही बन्दों को “गुप्तचर” कहा गया है!
 

ये जो तुम सारे काम रोक के टीवी पे आ रहा हॉट सीन देखते हो ना.. इसी को शास्त्रों में “संयम” कहा गया है!
 

ये जो फैमिली ग्रुप में नॉनवेज जोक गलती से भेजने के बाद घुटने और कलेजे में सनसनी फील करते हो ना.. शास्त्रों में इसी को “भय” और “प्रलय का संकेत” कहा गया है!
 

ये जो बनियान तक अम्मा से धुलवाने वाले बंदे शादी के बाद कमोड साफ़ करने को मजबूर होते हैं ना..
अर्थशात्र में इसी को “अवमूल्यन” कहा गया है!
 

ये जो तुम खूबसूरत लड़की के चक्कर मे उसके सड़ियल भाई को दोस्त बनाते फिरते हो,इसे शास्त्रों में “गधे को बाप बनाना” कहा गया है !
 

ये जो तुम चंद लाइक पाने के लिए अपने फेसबुक पोस्ट पर 72 लोगों को टैग करते हो न, शास्त्रों में इसी को “लोभ” कहा गया है !

ये जो आप मेट्रो में सामने खड़ी आपकी ओर प्यार से देखती खूबसूरत कन्या के लिए भी अपनी सीट नहीं छोड़ते है.. इसे ही शास्त्रों में “मोक्ष” कहा गया है!

रविवार, 21 जून 2020

साहसी माँ

सूरज सी होती,संवेदनहींन ये धरती,
सर पर सूरज,तलवों तपती धरती,
मां मुझसे और सहा नहीं जाता।
मां अब और चला नहीं जाता।

आज कंधों पर थैले,सर पर भारी गठरी,
गांव में था घमंड दिखाता,लड़का हूँ मैं शहरी।
हाड़ों पर गृहस्थी का बोझ देखा नहीं जाता।
तेरे दुःख से व्यथित,मुझसे चला नहीं जाता।

खून खौल उठता है माँ मेरा,
रगों में बहता खून लगता पानी,
जब जब मुझको है दिखता,
खून पसीना, छालों से बहता पानी।

तेरा साहस, देख ताक़त आ जाती है,
तेरी सांसों में,मेरी सांसों की गिनती हो जाती है।
चलेगी जब जहाँ तक,मैं चलूंगा
माँ तेरा बलिदान न भूलूंगा।