सांस लेने के लिए सांस कम पड़ गई,
नौजवानों तक की धड़कने थम गई।
वो बीच बीच मे जिक्र तो करता रहा,
पर नीरो गद्दी की फिक्र करता रहा।
मरघटों में लकड़ियां कम पड़ गई।
शव जलाने को जमीन कम पड़ गई।
वेदनाओं का ज्वालामुखी फटता रहा।
नीरो बातें इधर उधर की करता रहा।
धरती का सीना अर्थियों से लद गया,
प्रचण्ड अग्नि चिताओं से तप गया।
घाटों पर मौतों का मेला लग गया।
प्यारा नीरो जा कर मंच पर चढ़ गया।
कुछ तो मरे, कुछ को डर सताता रहा,
मृत्यु दानव सड़कों पर तांडव मचाता रहा,
काल एक एक कर सबको खाता रहा।
नीरो मौत की धुन बांसुरी पर बजाता रहा।
(जरूरी नहीं किसने लिखा है,जरूरी ये है कि क्यों और किसके लिए लिखा है।अपना नीरो आप चुनिए मैंने चुन लिया है।)
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