साथियों,घर में बंद हुए चार दिन हो चुके हैं।21 दिन का सरकारी फरमान भी जारी हो चूका है।चीन ने अपनी गैर जिम्मेदाराना खाने की आदतों से पूरे विश्व को मुसीबत में डाल दिया है।आंकड़ों को यहाँ रखना इसलिए जरूरी नहीं समझता क्योंकि ये लेख आप तक,जब भी पहुँचेगा कहानी कुछ और ही मोड़ ले चुकी होगी।विश्व में चीन,ईरान,इटली और स्पेन को सबसे ज्यादा चोट पँहुचायी है जो की अब भी जारी है।
पर इस बीमारी ने समाज की बहुत सी तहों को उजागर कर दिया है।लोगों को लोगों के सामने बेनक़ाब कर दिया है।हम किस कदर कठोर हो चुके हैं।इस बीमारी के सहारे कहीं न कहीं कुदरत ने हमें एक आईने के सामने खड़ा कर दिया है।पर ऐसी घटनाएं सुन ने को मिल रही है कि विश्वास नहीं होता।चीन के वुहान शहर में तालाबंदी के बाद,3 वर्ष बाद साफ़ नीला आसमान देखा गया।ये अपने आप में कितनी बड़ी बात है।चीन खुद प्रदुषण फेलाने का पर्याय बन चूका है।उसके यहाँ नीला आसमान दिख रहा है।
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| साभार:www.cnn.com |
नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैस में गिरावट दर्ज की गयी। माँसाहार भोजन की पूरी प्रक्रिया है वो स्वयं में कार्बन फुट प्रिंट बढ़ाने वाले सब से बड़े कारकों में से एक है।इसकी तुलना में शाकाहार भोजन का कार्बन फुटप्रिंट काफी कम है।चीन अप6नी गंदे पानी की समस्या से 3 दशक से अधिक समय से जूझ रहा है।मात्र तीन महीने में व्यापक स्तर की शहरी तालाबंदी ने कई जगहों के प्राकृतिक नदी नालों के जल प्रदूषण में सुधार देखने को मिला है।इटली का वेनिस शहर जो अपनी नहरों के लिए जाना जाता है।कभी ये नहरें डॉलफिन के लिए मशहूर थीं।पर अंधाधुंध मुनाफाखोरी के चलते शहर पर बढ़ते पर्यटकों के दबाव ने इस इको सिस्टम को ही बर्बाद कर दिया था।
कुछ महीनों की ताला बंदी ने मछलियां शहर में दिखने लगी है।पर्यावरणविदों,का कहना है कि प्रकृति,मानव के महामारी के जंजाल में उलझने से खुद को इस मुक्त पा कर अपनी मरहम पट्टी कर रही है।पर ये नहीं लगता कि प्रकृति मानव प्रकोप से ज्यादा दिन बच पायेगी।मुनाफा खाने वाले आदमखोर लौटेंगे और फिर से कुदरत को नोच नोच कर अपना पेट भरना चालू कर देंगे।
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| साभार:विकिपीडिया |
आर्थिक जगत ने जितनी चोट खायी है वो देखते ही बनती है।मुनाफे खोरी की गन्दी लत ने औद्योगिक क्षेत्र के निर्माताओं को चीन में आकर्षित किया।आबादी इतनी अधिक है कि पेट भर जाये वही बहुत है। मेहनत मजदूरी विश्व में सब से सस्ती है।चीन ने खुद पुरे विश्व से आदमखोर मुनाफाखोरों को स्वयं अपनी जनता के शोषण के लिए आमंत्रित किया।कोई बेजोड़ श्रम कानून व्यवस्था नहीं है और न ही इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी है।हालात इस कदर बेकाबू है कि विश्व की बड़ी बड़ी कंपनी जो कि चीन की कंपनियों के निम्न गुडवत्ता उत्पाद के प्रचार को बढ़ावा देती थी,उनकी स्वयं के कई उत्पादन इकाईयां चीन में हैं।यदि चीन में इकाई नहीं भी है तो यहीं की कंपनियों से सामान बनवा कर पूरे विश्व में क्या अपने देश में भी बेचा जाता है।चीन ने भी अपनी गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या को खूब नोचा।औद्योगिक क्षेत्र में हर उत्पाद की नक़ल या फिर उसकी जगह ले सकने वाले उत्पाद की बाजार में भरमार कर दी।चीन का फायदा कमाने का भी एक तरीका है। या तो आप कम बनाओ और अच्छा बनाओ ताकि उसका दाम कम न करना पड़े और आप उस उत्पाद को प्रतिस्पर्धा में आगे ले जाओ।दूसरा तरीका है निम्न गुणवत्ता का उत्पाद बनाओ और कम से कम मार्जिन पर बेचो।क्वालिटी से नहीं क्वांटिटी से कमाओ।पर चीन विश्व में अमेरिका और रूस की होड़ में और भारत को पछाड़ने हुड़क में पागल हो गया।कई दशकों तक चीन ने विकसित देशों का कचरा ढोया।उसे पुनः चक्रित कर कच्चा माल निकाला।उस से सस्ते उत्पाद तैयार किये।तीसरे विश्व देशों में जहां उच्च गुणवत्ता के महंगे उत्पाद लोगों की पहुँच से दूर थे वहां उन्हें उतारा गया।जब वहां से मुनाफा कमाया तो विकसित देशों में भी सस्ता सामान उतार दिया।अब जब एक स्तर पर आने के बाद ये औद्योगिक कचरा खुद के लिए ही मुसीबत बन ने लगा,तो इससे किनारा करना चालू कर दिया।कोरोना ने बड़ी बड़ी कंपनियों को घुटने पर ला दिया है।चीन की जिस जनता से मुनाफा कमाया गया।कभी उसे वो सुविधाएँ ही नहीं दी गयी।जिसके कारण श्रमिक वर्ग इस महामारी के आगे खड़ा हो ही नहीं पाया।बीमारी भी ऐसी की,वर्ग नहीं देखती।अब ये श्रमिक वर्ग जो की विकसित देशों के औद्योगिक और आर्थिक ढांचे की रीढ़ था वो ही भर भरा गया।
एक बार जापान के एक विद्वान 'केनिची ओहमें ने चीन के बारे में कहा कि"चीन पूंजीवाद को सबसे कच्चे रूप में प्रदर्शित करता है। ग्वांगझू में एक कारखाने के प्रबंधक को पता चलता है कि कुछ श्रमिकों की नज़र उनके द्वारा किए गए काम के परिणामस्वरूप बिगड़ती है। तो उन्हें एक सप्ताह के वेतन के साथ नौकरी से निकाल दिया जायेगा। वे अब उनकी जिम्मेदारी नहीं हैं।वहीं एक जापानी प्रबंधक को इस तरह का कार्य करने के लिए, वह कारावास का जोखिम उठाना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए ब्रिटेन की एक फर्म पर मुकदमा चलाया जा सकता है"।
भारत भी इस वैश्वीकरण के समय में अछूता नहीं रह सकता है।शेयर बाजार में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं।पर शेयर मार्किट में गिरावट से उन लोगों को मौका मिला जो भारी खरीदारी की राह देख रहे थे।इन खरीदारों ने शेयर मार्केट को थोड़ा सहारा दिया है। इस से बड़ी समस्या ये है कि देश में काम करने वाली जनसँख्या में 43 प्रतिशत लोग अपने घरों से दूर रह कर काम करते हैं।21 दिनों के तालाबंदी के पीछे का कारण ये भी अगर लोगों ने घबरा कर आवाजाही शुरू कर दी तो बीमारी को भयावह रूप लेते देर नहीं लगेगी।।देश में 12000 से ज्यादा ट्रेनें रोज चलती हैं।एक करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में यात्रा कर रहे होते हैं।अति पलायन की भयावह स्तिथि को रोकने के लिए ही साहसिक परन्तु कड़ा कदम सरकार को मज़बूरी में उठाना पड़ा।पर यहीं से नई समस्या भी शुरू होती है।दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों में दूर दराज की मेहनती मजदूर जनता पुरे दिन खटती है और रात में चौराहों पर फुटपाथ पर सोती है।इन लोगों की स्तिथि सबसे अधिक दयनीय है।ऐसे दिहाड़ी मजदूरों ने व्यापक तो नहीं कह सकते पर परिवहन व्यवस्था ठप होने के बाद पैदल ही घर जाना चालू कर दिया है।प्रशासन इस पर काम कर तो रहा है।देश के जिम्मेदार नागरिक भी राशन और भोजन सामग्री बाँटते देखे गए हैं।सरकार ने इस स्तिथि से निपटने के लिए आर्थिक मदद की घोषणा तो की है पर असंगठित क्षेत्र में मजदूरों की संख्या का आंकड़ा भी तय नहीं है।वहीं विदेशों में फंसे कामकाजी लोगों का भी बुरा हाल है।लोग घरों में बंद पड़े हैं।अब प्रवासियों को एयरलिफ्ट किया जा रहा है।पर गरीब दिहाड़ी मजबूर अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर पैदल निकल पड़े है।इनको कोई लिफ्ट नहीं देने वाला है।
जो समाज अपने विकसित गुणवत्ता का डंका बजाता हो उसे भी कोविड-19 ने नहीं छोड़ा।समाज का दोगलापन निकल कर बाहर आया है।चाहे विश्व की कोई भी सामाजिक व्यवस्था अपने विकास का कितना ही गुणगान कर ले परंतु विपत्ति के समय ही समाज की उन्नति की कठिन परीक्षा होती है।समाज को सफल बनाने में उसके सदस्यों यानि हमारी मुख्य भूमिका होती है।वो ऐसे की किसी भी स्तिथि,परिस्तिथि या किसी घटना को ले कर हमारा नजरिया क्या है।हम किसी भी छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी बात पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।ये कुछ ऐसी छोटी बातें होती हैं जिनका परिणाम छोटा दिखने में भले से हो परन्तु कई परिस्तिथियों में ये निर्णायक भी साबित हो सकता है।निर्णय गलत होगा या सही प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है।आइये फिलहाल के कुछ उदाहरणों से समझें।
कर्फ्यू के बाद गली में दबे आदमखोरों ने दांत दिखा दिए।जी हां छोटे छोटे सामानों पर कालाबाज़ारी देखी गयी।हैण्ड सेनिटाइजर तक पर गोरख धंधा चला।ये सिर्फ भारत की बात नहीं है।ऐसे मास्क जो धूल तक न रोक पाए,महंगे दामों में मिल रहे हैं।अमेरिका में भी यही देखने को मिला।जिसको जैसे मौका मिला उसने जनता को नोंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी।नोटबंदी के दौरान 400 रुपये किलो नमक बिकने की बात याद आ गई।
हमें बोला गया कि देश में कोविड-19 की समस्या में हमारा सहारा बने शासकीय व् प्रबन्धकीय व्यवस्था तथा उस से जुड़े लोगों के लिए जनता कर्फ्यू वाले दिन शाम को ताली बजा कर या थाली पिट कर उनका मनोबल बढ़ाया जाए।पर इस मनोबल बढ़ाने वाली बात की जगह न जाने कब ताली और थाली की कंपन से वायरस के मरने की अफवाह ने जन्म ले लिया।पता ही नहीं चल पाया।देखते ही देखते 9 बजे समाप्त होने वाला जनता कर्फ्यू 5 बजे सामूहिक थाली पीटो अभियान में रूपांतरित हो गया।अहमदाबाद में तो लोग एक चौराहे पर जमा हो कर थाली पिट कर गरबा करने लगे।कुछ महानुभावो ने टिन टप्पर पिट पिट कर कोरोना के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।एक मोहतरमा ने तो थाली पीटी ही साथ में गो कोरोना के नारे लगाये।समाज में विकृत मानसिकता का दंश उत्तर पूर्व भारत के निवासियों को भी झेलना पड़ रहा है।उनका कसूर ये है कि वो दिखने में चीन के लोगों जैसे है।जबकि दोष देश के अनपढ़ लोगों का है जो की भूगोल में फ़ैल हो गए थे या रट्टा मार के या पैसे दे कर पास हुए थे।ये वही लोग हैं जो कि कम मजदूरी पर मजदूर खोजते हैं। फिर अविकसित और अर्धशिक्षित राज्यों से आया मजदुर जब इनके आस पास सफाई नहीं रख पाता तो उसे ही ये लोग गलियाते हैं।जबकि उसके इस जीवनस्तर के लिए यही लोग जिम्मेदार होते हैं।
बात यही नहीं थमी कई धर्म के ठेकेदारों ने गौ मूत्र के सेवन की बात कही।यहाँ तक कि एयरपोर्ट पर गौमूत्र रखवाने की बात सामने आयी।एक आचार्य ने तो गौमूत्र पार्टी तक रख दी।अब रुझान तो आने बनते थे।हुआ ये की देहरादून में एक ऐसी पार्टी के दौरान सेवनकर्ता को अगली सुबह तुल्ली लग गयी।उन्होंने आयोजक के खिलाफ FIR दर्ज करवा दी।वही एक धर्म गुरु तो बोले उनके दिमाग में फार्मूला आ चुका है।
ये सब बातें तो हुई समाज के जमीनी वर्गों की जो कि रोज कुआँ खोद कर पानी पीतें हैं।पर उनका क्या जिनके पेट भरें है?अरे भाई उन्होंने ने भी कोविड संकट में लोगों से हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा कर वंचना की कि महानुभावों घर में रहो।पर ये लोग दिल्ली के दंगों के दौरान क्यों नहीं बोले जब 52 लोग मारे गए।उसके पीछे है इनका वर्गवादी कीड़ा।जी हां क्योंकि जो लग मरे थे वो इनके काम के नहीं थे।याद रखियेगा जब जब मुसीबत आएगी ये उच्च कुलीन वर्ग सबसे पहले अपनी विलासी मांद में भागेगा।हुआ भी यही मांद में भागने में उपरांत याद आया,आना तो फिर बाहर है।इसी भोली भाली जनता के बीच।जिसे अशिक्षित रखने का फायदा तो मिला पर यही अशिक्षित जनता अर्थ का अनर्थ बनाते देर नहीं लगाएगी।अब मांद के अंदर से गीदड़ों ने हुंकार भरी कि "बाहर मत निकलो,वरना जब कभी हम बाहर आएंगे तो हमे भी कोविड 19 से कोरोना हो जायेगा।लेख कहीं से भी घर रहने के सन्देश का उपहास नहीं करता परतुं इन सन्देश दाताओं का मुखोटा निकालने का प्रयास जरूर करता है।
भारतीय समाज एक कहावत के लिए मशहूर है,कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता है।वो ऐसे कि 21 दिन के तालाबंदी की घोषणा के बाद भी समाज खलनायकों से भरा पड़ा है।लोग अभी भी घर के बाहर न जाने क्या चर रहे थे।अब बारी आई हमारी ग्वाला जैसी पुलिस की,जिसका एकमात्र हथियार ही लाठी डंडा है।लठ पिलाई के वो रुझान देखने को मिले की मन रह रह कर कौंध जाता है।ऐसा प्रतीत होता है कि थर्ड डिग्री में प्राण पखेरू उड़ने से ठीक पहले तक मारते होंगे।परन्तु ये पुलिस की सख्ती से ज्यादा मज़बूरी बनता दिखा।आखिर इस छुआछूत महामारी की वजह से उन्हें सड़कों पर नहीं खड़ा होना पड़ रहा है बल्कि समाज के गैर जिम्मेदार लोगों की वजह से वो बाहर हैं।वही लोग हैं कि मान ने को तैयार नहीं।कुछ विकलांग बुद्धियों की वजह से जरुरतमंद लोगों की भी पिटाई हो गयी।पर पुलिस वाले गरीब लोगों की सहायता करते हुए भी दिखे जोकि समाज में उनके दर्जे को बढ़ाएगा ही।ये वही समाज है जो सरकारी कंपनियों और सुविधाओं के निजीकरण की बात करता है परंतु समस्या के समाधान के लिए आज सरकारी ढांचे पर टकटकी लगाए घरों में बैठा है।स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के रक्षा क्षेत्र की अग्रणी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को 30 हजार वेंटीलेटर बनाने के आदेश जारी करें हैं।ये कंपनी देश सेवा में 1954 से समर्पित है।
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में,राजनितिक टिका टिप्पणी न हो,तब तक लेख को पूरा मान लेना गलत है।क्योंकि कोविड-19 से व्याप्त संकट में राजनितिक सफलताएं भी देखने को मिली तो वही राजनितिक विफलताएं भी दिखी।देश की ढांचागत मूलभूत सुविधाएं देश की राजनितिक सफलता का परिमाण सिद्ध होती हैं।जहां जापान,दक्षिण कोरिया,जर्मनी और कनाडा जैसे देशों ने अपनी जनता के प्रति वफ़ादारी को सिद्ध कर दिया।वहीँ चीन,ईरान,स्पेन और इटली की पोल खोल दी।ये मात्र 3 महीनों का खेल है।अभी ये समस्या भारत देश में अभी दूसरे चरण में हैं।परंतु एक बाद आते एक आदेशों से समस्या की विकटता का पता लग रहा है कि भारत के लिए किस हद तक बुरे हालात पैदा हो सकते हैं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार,18 जनवरी,2020 से 23 मार्च,2020 तक पंद्रह लाख के करीब प्रवासी भारतीय वापिस देश लौट आये हैं।*
वहीँ प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो,भारत सरकार के अनुसार 6 मार्च,2020 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में देखा गया कि 30 अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर 6.5 लाख प्रवासी भारतीयों की जाँच की जा चुकी है।**
यहाँ प्रति किलोमीटर में 400 लोगों का औसतन जनसंख्या घनत्व है।कुछ महानगरों में ये घनत्व राष्ट्रिय औसत से भी ज्यादा है। 0.5 बेड प्रति 1000 लोगों पर हैं।जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बेड की संख्या कम से कम 5 तो होनी ही चाहिए।वही डॉक्टर का अनुपात 0.8 है प्रति 1000 लोगों पर।जबकि इटली में डॉक्टर अनुपात पांच गुना ज्यादा है।***
समय अभी तो खराब है।पर खतरा टलने के बाद प्रश्न उठेंगे कि इतनी बड़ी संख्या की घोषणा का आखिर होता क्या है?धरातल पर कुछ दिखता नहीं?पर ये बात भी तय है कि भारतीय मीडिया घर की सबसे कुटिल बहु की तरह सब का ध्यान कहीं और ही मोड़ देगी और किसी को कुछ नहीं पता चलेगा।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार,18 जनवरी,2020 से 23 मार्च,2020 तक पंद्रह लाख के करीब प्रवासी भारतीय वापिस देश लौट आये हैं।*
वहीँ प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो,भारत सरकार के अनुसार 6 मार्च,2020 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में देखा गया कि 30 अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर 6.5 लाख प्रवासी भारतीयों की जाँच की जा चुकी है।**
यहाँ प्रति किलोमीटर में 400 लोगों का औसतन जनसंख्या घनत्व है।कुछ महानगरों में ये घनत्व राष्ट्रिय औसत से भी ज्यादा है। 0.5 बेड प्रति 1000 लोगों पर हैं।जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बेड की संख्या कम से कम 5 तो होनी ही चाहिए।वही डॉक्टर का अनुपात 0.8 है प्रति 1000 लोगों पर।जबकि इटली में डॉक्टर अनुपात पांच गुना ज्यादा है।***
साथियों,इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड-19 संकट ने महा धुरंधर राष्ट्रों को अपने सामने शास्टांग प्रणाम करवा दिया।भारत जैसे विकासशील देश में ये समस्या भयावह रूप ले सकती है।इसे कोई दवा नहीं इसे सिर्फ और सिर्फ आप और हम रोक सकते हैं।आपकी घबराहट ही औरों का अनावश्यक फायदा भी बन रही है।जिन लोगों को इस अव्यवस्था में भी अपनी व्यवस्था पहले दिखती है वो नहीं सुधरने वाले हैं।सुधरना आपको और हमें है।समाज को आपको और हमें ही आगे ले जाना है।ये समस्या समाज को पीछे धकेल सकती है।इसलिए इस से लड़ने के हमें आगे नहीं आना हैं बल्कि घर में रह कर थोड़ा सा पीछे हट कर इसका सामना करना है।ये समस्या सड़कों पर उतर कर सामना करने की नहीं है।बल्कि इसका समाधान घर में साफ सफाई को ढाल बना कर लड़ने की युद्धस्तर तैयारी की मांग करता है।जब आप स्वच्छ भारत की बात कर सकते हैं तो उसे अपने आचरण में स्थापित करने से पीछे क्यों हटना।अपने बौद्धिक विवेक का उपयोग कीजिये और सतर्क रहिये सजग बनिए।
जय हिन्द जय भारत स्वस्थ भारत।
*https://timesofindia.indiatimes.com/india/15-lakh-who-flew-back-to-india-between-jan-18-mar-23-under-lens/articleshow/7485555
**https://pib.gov.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=199929
*https://timesofindia.indiatimes.com/india/15-lakh-who-flew-back-to-india-between-jan-18-mar-23-under-lens/articleshow/7485555
**https://pib.gov.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=199929


