बुधवार, 28 अप्रैल 2021

सवाल पूछो!

आवाम प्यासी रही होगी,
पी के खून,मुँह न पोछे,
कोई तो ग़रज रही होगी,
जो कोई सवाल नहीं पूछे।

वज़ीर करता रहा मनमानी,
आवाम सहती रही बेईमानी।
थी किस नशे में,जो न सूझे,
तभी कोई सवाल नहीं पूछे।

अशर्फियाँ तो न बटीं थी,
खून से गलियां सनी थी,
ऐसे हालात पे भी न टूटे,
कोई सवाल नहीं पूछे।

मदार का सुरमा लगा लो,
जो आंख इतने पे न फूटे,
मौतों से सराबोर है शहर सारा,
जो अब भी सवाल न पूछे।

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

नीरो की बांसुरी

सांस लेने के लिए सांस कम पड़ गई,
नौजवानों तक की धड़कने थम गई।
वो बीच बीच मे जिक्र तो करता रहा,
पर नीरो गद्दी की फिक्र करता रहा।

मरघटों में लकड़ियां कम पड़ गई।
शव जलाने को जमीन कम पड़ गई।
वेदनाओं का ज्वालामुखी फटता रहा।
नीरो बातें इधर उधर की करता रहा।

धरती का सीना अर्थियों से लद गया,
प्रचण्ड अग्नि चिताओं से तप गया।
घाटों पर मौतों का मेला लग गया।
प्यारा नीरो जा कर मंच पर चढ़ गया।

कुछ तो मरे, कुछ को डर सताता रहा,
मृत्यु दानव सड़कों पर तांडव मचाता रहा,
काल एक एक कर सबको खाता रहा।
नीरो मौत की धुन बांसुरी पर बजाता रहा।

(जरूरी नहीं किसने लिखा है,जरूरी ये है कि क्यों और किसके लिए लिखा है।अपना नीरो आप चुनिए मैंने चुन लिया है।)

मुखौटा

डरता हूँ कहीं अपनों से पराया न हो जाऊं।
मैं बेबाक नहीं रहा,जो हर बात कह सकूँ।
डर जाता हूँ,जो अपनों से सताया जाऊं।
आईना नहीं,जो हर बात सच कह सकूँ।

किसी की कसौटी पर क्या परख करूँ?
अब तो खुद को परखना भूल गया हूँ।
अब मैं मेरे पैमानों का भी क्या करूँ?
एक ऐसे सांचे में ढाल दिया गया हूँ।

मैंने तो कब का सोचना ही छोड़ दिया हैं,
पर सोचने का नाटक अच्छा निभा लेता हूँ।
सब निजी उपज की राय पे चलते हैं।
उनकी उपज में कुछ अपना उपजा लेता हूँ।

जब देखता हूँ,अपनी ही गाने वालों को।
खुद तर्क और आंकड़ों को जला देता हूँ।
प्रणाम कर लेता हूँ,नौनिहाल ज्ञानियों को।
अपने अर्जित ज्ञान को स्वाहा कर देता हूँ।

चाभी गुमा चुका हूँ,खुली सोच की दूर कहीं।
तुम खुली बात करना,दबी सोच की हर कहीं।
मुझे खोजना हो,तो मिलुंगा अंधेरों में कहीं।
गलती से खोजने,मत लगना उजालों में कहीं।
नितेश तिवारी "रचनाकर"