डरता हूँ कहीं अपनों से पराया न हो जाऊं।
मैं बेबाक नहीं रहा,जो हर बात कह सकूँ।
डर जाता हूँ,जो अपनों से सताया जाऊं।
आईना नहीं,जो हर बात सच कह सकूँ।
किसी की कसौटी पर क्या परख करूँ?
अब तो खुद को परखना भूल गया हूँ।
अब मैं मेरे पैमानों का भी क्या करूँ?
एक ऐसे सांचे में ढाल दिया गया हूँ।
मैंने तो कब का सोचना ही छोड़ दिया हैं,
पर सोचने का नाटक अच्छा निभा लेता हूँ।
सब निजी उपज की राय पे चलते हैं।
उनकी उपज में कुछ अपना उपजा लेता हूँ।
जब देखता हूँ,अपनी ही गाने वालों को।
खुद तर्क और आंकड़ों को जला देता हूँ।
प्रणाम कर लेता हूँ,नौनिहाल ज्ञानियों को।
अपने अर्जित ज्ञान को स्वाहा कर देता हूँ।
चाभी गुमा चुका हूँ,खुली सोच की दूर कहीं।
तुम खुली बात करना,दबी सोच की हर कहीं।
मुझे खोजना हो,तो मिलुंगा अंधेरों में कहीं।
गलती से खोजने,मत लगना उजालों में कहीं।
नितेश तिवारी "रचनाकर"