आवाम प्यासी रही होगी,
पी के खून,मुँह न पोछे,
कोई तो ग़रज रही होगी,
जो कोई सवाल नहीं पूछे।
वज़ीर करता रहा मनमानी,
आवाम सहती रही बेईमानी।
थी किस नशे में,जो न सूझे,
तभी कोई सवाल नहीं पूछे।
अशर्फियाँ तो न बटीं थी,
खून से गलियां सनी थी,
ऐसे हालात पे भी न टूटे,
कोई सवाल नहीं पूछे।
मदार का सुरमा लगा लो,
जो आंख इतने पे न फूटे,
मौतों से सराबोर है शहर सारा,
जो अब भी सवाल न पूछे।
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