बुधवार, 18 अगस्त 2021

जलन

जलन
अगर नहीं किसी को झुका सकते
तो आखिर लोग जलते क्यों हैं?
अगर नहीं किसी को देख सकते,
तो उस को इतना देखते क्यों है?

जब खुजली नहीं जाती है।
फिर भी आंखे मसलते क्यों हैं?
कुढ़न की बदनामी नहीं जाती है।
फिर भी कुढ़ने को बेबस क्यों है।

जलन खा जाती है इंसान को,
निगल जाती है,इंसानियत को,
दोमुंहे बनकर घूमना पड़ता है।
जन्म देती है,हैवानियत को।

ऐसे लोग जीवित नहीं होते।
अंदर से मर चुके होते है।
सीधे कुछ कह नहीं पाते,
ये लोग बहुत दोगले होते हैं।





मंगलवार, 17 अगस्त 2021

मिथ्या से चोरी


भनक तो उसको लगी थी,
पर देखती ही रह गयी थी,
शमा जला कर चला आया हूँ।
गजरे से महक ही चुरा लाया हूँ।

अशर्फियों से आशिक़ी थी उसको,
चाशनी बेस्वाद लगती थी उसको,
ज़िंदगी का जश्न मना के आया हूँ।
उसकी आशिक़ी ही चुरा लाया हूँ।

वो मिथ्या में जी रही थी,
मिथक भंग कर आया हूँ।
मर मर के जी रही थी।
उसकी मिथ्या चुरा लाया हूँ।

झरोखे से बाट जोहती होगी,
भीड़ में मुझे खोजती होगी।
सुखचैन उड़ा कर आया हूँ,
नैनों को ही चुरा लाया हूँ।