भनक तो उसको लगी थी,
पर देखती ही रह गयी थी,
शमा जला कर चला आया हूँ।
गजरे से महक ही चुरा लाया हूँ।
अशर्फियों से आशिक़ी थी उसको,
चाशनी बेस्वाद लगती थी उसको,
ज़िंदगी का जश्न मना के आया हूँ।
उसकी आशिक़ी ही चुरा लाया हूँ।
वो मिथ्या में जी रही थी,
मिथक भंग कर आया हूँ।
मर मर के जी रही थी।
उसकी मिथ्या चुरा लाया हूँ।
झरोखे से बाट जोहती होगी,
भीड़ में मुझे खोजती होगी।
सुखचैन उड़ा कर आया हूँ,
नैनों को ही चुरा लाया हूँ।
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