रविवार, 13 सितंबर 2020

याद रखना

गहरी जान पहचान है आपसे,
खूद से दुर न समझने लगना।
कहीं दूर थोड़े ही गए है आपसे,
हमे अपनी यादों में याद रखना।

बनाये रखना ये खुशनुमा फितरत,
जहन में हमारा भी ख्याल रखना,
मिले नाती-पोतों से थोड़ी फुरसत,
तो हम लोगों को भी याद करना।

जब मांगों कुछ भगवान से,
भुला न देना हमे भूल से,
अपना खूब ख्याल तो रखना,
पर हमे दुआओं में याद रखना।






बुधवार, 24 जून 2020

मुफ्त का ज्ञान

ये जो तुम लडकियों के नार्मल से नार्मल पोस्ट पर भी वाहवाही करते हो न, शास्त्रों में ऐसे लोगों को ही "पिस्सू" कहा गया है।
 

ये जो तुम बचपन में साईकिल के पिछली पहिये का चैन उतर जाने पर उल्टा पैडल मारकर चैन चढ़ा देते थे, शास्त्रों में इसी को “टेलेंट” कहते हैं!
 

ये जो तुम पूरा ध्यान लगाकर पीछे के दांत में फंसे आम के रेशे निकाल लेते हो, शास्त्रों में इसी को “लगन” बताया गया है!
 

ये जो तुम बीवी के साथ होते हुए भी सामने से आती कन्या का कनखियों से स्कैन निकाल लेते जो, इसी गुण को शास्त्रों में “चपलता” कहा गया है!
 

ये जो आप 20 की सब्जी में भी लड़-भिड़ के मुफ्त की मिर्ची और धनिया ले आती हैं, इसी को सभी शास्त्रों में “धर्म की जीत” बताया गया है!
 

ये जो तुम नींद का बहाना बना के रूमपार्टनर और उसके गर्लफ्रेंड की बात रात भर सुनते रहते हो,
शास्त्रों में ऐसे ही बन्दों को “गुप्तचर” कहा गया है!
 

ये जो तुम सारे काम रोक के टीवी पे आ रहा हॉट सीन देखते हो ना.. इसी को शास्त्रों में “संयम” कहा गया है!
 

ये जो फैमिली ग्रुप में नॉनवेज जोक गलती से भेजने के बाद घुटने और कलेजे में सनसनी फील करते हो ना.. शास्त्रों में इसी को “भय” और “प्रलय का संकेत” कहा गया है!
 

ये जो बनियान तक अम्मा से धुलवाने वाले बंदे शादी के बाद कमोड साफ़ करने को मजबूर होते हैं ना..
अर्थशात्र में इसी को “अवमूल्यन” कहा गया है!
 

ये जो तुम खूबसूरत लड़की के चक्कर मे उसके सड़ियल भाई को दोस्त बनाते फिरते हो,इसे शास्त्रों में “गधे को बाप बनाना” कहा गया है !
 

ये जो तुम चंद लाइक पाने के लिए अपने फेसबुक पोस्ट पर 72 लोगों को टैग करते हो न, शास्त्रों में इसी को “लोभ” कहा गया है !

ये जो आप मेट्रो में सामने खड़ी आपकी ओर प्यार से देखती खूबसूरत कन्या के लिए भी अपनी सीट नहीं छोड़ते है.. इसे ही शास्त्रों में “मोक्ष” कहा गया है!

रविवार, 21 जून 2020

साहसी माँ

सूरज सी होती,संवेदनहींन ये धरती,
सर पर सूरज,तलवों तपती धरती,
मां मुझसे और सहा नहीं जाता।
मां अब और चला नहीं जाता।

आज कंधों पर थैले,सर पर भारी गठरी,
गांव में था घमंड दिखाता,लड़का हूँ मैं शहरी।
हाड़ों पर गृहस्थी का बोझ देखा नहीं जाता।
तेरे दुःख से व्यथित,मुझसे चला नहीं जाता।

खून खौल उठता है माँ मेरा,
रगों में बहता खून लगता पानी,
जब जब मुझको है दिखता,
खून पसीना, छालों से बहता पानी।

तेरा साहस, देख ताक़त आ जाती है,
तेरी सांसों में,मेरी सांसों की गिनती हो जाती है।
चलेगी जब जहाँ तक,मैं चलूंगा
माँ तेरा बलिदान न भूलूंगा।









गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

The Burning Desire

Why you call me liar,
For examine,you ever me hire?
There is nobody who knows,that,
For you,I have Burning Desire.

For you,I can do anything,
I can leave the truth,being for you liar.
I can leave flying by crushing my wing.,
Because,I have for you The Burning Desire.

Do you know?
How much I love you?
Your ignorance,make my heart drier.
Always you burn me like fire.
You will never fill baby,
How much I have Burning Desire.

That doesn't mean,
I want burn my desire for you,
That's mean,
Born to burn in love of you

Hold my hand,
Come with me on stairs of my life,
Take some steps higher,
Then you will see,
In my Heart,I have Burning Desire.

Nitesh Tiwari "Gaumedh"

चीख

शशांक सिंह राजपूत को समर्पित कविता।



कहीं खुद से बोलना,भूल तो नहीं गया!
जबकि औरों से बात करता नहीं।
अगर चीख दूँ,जोर से अकेले में कहीं,
पता नहीं क्यों,खुद को ही सुनता नहीं।

मैं घुल रहा किसी कश्मकश में अंदर कहीं,
मैं कौन हूँ?समझ पा रहा हूँ या नहीं?
जैसे शक्कर घुल जाती हो पानी में,
क्या था मैं पानी?या अब शक्कर तो नहीं?

चीखना चाहता तो हूँ,मैं बहुत जोर से
चिल्लाना चाहता हूँ ,बहुत जोर से
पर लगता है,मैं अंदर ही जप्त तो नहीं?
मैं आहत हूँ,गुम हो चुकी आहट से कहीं,
लगता है,अपने अंदर ही मैं दफ़्न तो नहीं?

बुधवार, 25 मार्च 2020

कोविड19- समाज की परतें खोलने वाली बीमारी

साथियों,घर में बंद हुए चार दिन हो चुके हैं।21 दिन का सरकारी फरमान भी जारी हो चूका है।चीन ने अपनी गैर जिम्मेदाराना खाने की आदतों से पूरे विश्व को मुसीबत में डाल दिया है।आंकड़ों को यहाँ रखना इसलिए जरूरी नहीं समझता क्योंकि ये लेख आप तक,जब भी पहुँचेगा कहानी कुछ और ही मोड़ ले चुकी होगी।विश्व में चीन,ईरान,इटली और स्पेन को सबसे ज्यादा चोट पँहुचायी है जो की अब भी जारी है।
पर इस बीमारी ने समाज की बहुत सी तहों को उजागर कर दिया है।लोगों को लोगों के सामने बेनक़ाब कर दिया है।हम किस कदर कठोर हो चुके हैं।इस बीमारी के सहारे कहीं न कहीं कुदरत ने हमें एक आईने के सामने खड़ा कर दिया है।पर ऐसी घटनाएं सुन ने को मिल रही है कि विश्वास नहीं होता।चीन के वुहान शहर में तालाबंदी के बाद,3 वर्ष बाद साफ़ नीला आसमान देखा गया।ये अपने आप में कितनी बड़ी बात है।चीन खुद प्रदुषण फेलाने का पर्याय बन चूका है।उसके यहाँ नीला आसमान दिख रहा है।
साभार:www.cnn.com
नासा ने कोरोना से पीड़ित चीन के शहरों के ऊपर के आसमान की फोटो जारी की।जिसमें पहले की तुलना में ज्यादा साफ़ आसमान देखने को मिला।पर अमेरिकी मीडिया ने मौके को भुनाया तो खूब।पर क्या कभी अपने यहाँ प्रदुषण की स्तिथि को इस प्रकार स्वीकार करेगा?आशा तो यही है कि इस तरह कि चीन की स्तिथि दिखा कर उसे खलनायक दिखाने वाला अमरीकी मीडिया अपनी भी तालाबंदी के दौरान अपने पर्यावरण में हुए बदलावों की तुलनात्मक फोटो को जारी करेगा।


नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैस में गिरावट दर्ज की गयी। माँसाहार भोजन की पूरी प्रक्रिया है वो स्वयं में कार्बन फुट प्रिंट बढ़ाने वाले सब से बड़े कारकों में से एक है।इसकी तुलना में शाकाहार भोजन का कार्बन फुटप्रिंट काफी कम है।चीन अप6नी गंदे पानी की समस्या से 3 दशक से अधिक समय से जूझ रहा है।मात्र तीन महीने में व्यापक स्तर की शहरी तालाबंदी ने कई जगहों के प्राकृतिक नदी नालों के जल प्रदूषण में सुधार देखने को मिला है।इटली का वेनिस शहर जो अपनी नहरों के लिए जाना जाता है।कभी ये नहरें डॉलफिन के लिए मशहूर थीं।पर अंधाधुंध मुनाफाखोरी के चलते शहर पर बढ़ते पर्यटकों के दबाव ने इस इको सिस्टम को ही बर्बाद कर दिया था।
कुछ महीनों की ताला बंदी ने मछलियां शहर में दिखने लगी है।पर्यावरणविदों,का कहना है कि प्रकृति,मानव के महामारी के जंजाल में उलझने से खुद को इस मुक्त पा कर अपनी मरहम पट्टी कर रही है।पर ये नहीं लगता कि प्रकृति मानव प्रकोप से ज्यादा दिन बच पायेगी।मुनाफा खाने वाले आदमखोर लौटेंगे और फिर से कुदरत को नोच नोच कर अपना पेट भरना चालू कर देंगे।
साभार:विकिपीडिया
अफ्रीका महाद्वीप में दक्षिण अफ्रीका सबसे ज्यादा विकसित है और वहां ही सबसे ज्यादा कोविड-19 पीड़ित मिले हैं।ये लेख लिखने तक 927 लोग कोविड 19 से पीड़ित मिले।यानि कि वैश्विक जगत से अछूते और प्रकृति के करीब जो देश हैं वहां कोरोना का असर इतना अधिक नहीं है।

आर्थिक जगत ने जितनी चोट खायी है वो देखते ही बनती है।मुनाफे खोरी की गन्दी लत ने औद्योगिक क्षेत्र के निर्माताओं को चीन में आकर्षित किया।आबादी इतनी अधिक है कि पेट भर जाये वही बहुत है। मेहनत मजदूरी विश्व में सब से सस्ती है।चीन ने खुद पुरे विश्व से आदमखोर मुनाफाखोरों को स्वयं अपनी जनता के शोषण के लिए आमंत्रित किया।कोई बेजोड़ श्रम कानून व्यवस्था नहीं है और न ही इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी है।हालात इस कदर बेकाबू है कि विश्व की बड़ी बड़ी कंपनी जो कि चीन की कंपनियों के निम्न गुडवत्ता उत्पाद के प्रचार को बढ़ावा देती थी,उनकी स्वयं के कई उत्पादन इकाईयां चीन में हैं।यदि चीन में इकाई नहीं भी है तो यहीं की कंपनियों से सामान बनवा कर पूरे विश्व में क्या अपने देश में भी बेचा जाता है।चीन ने भी अपनी गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या को खूब नोचा।औद्योगिक क्षेत्र में हर उत्पाद की नक़ल या फिर उसकी जगह ले सकने वाले उत्पाद की बाजार में भरमार कर दी।चीन का फायदा कमाने का भी एक तरीका है। या तो आप कम बनाओ और अच्छा बनाओ ताकि उसका दाम कम न करना पड़े और आप उस उत्पाद को प्रतिस्पर्धा में आगे ले जाओ।दूसरा तरीका है निम्न गुणवत्ता का उत्पाद बनाओ और कम से कम मार्जिन पर बेचो।क्वालिटी से नहीं क्वांटिटी से कमाओ।पर चीन विश्व में अमेरिका और रूस की होड़ में और भारत को पछाड़ने हुड़क में पागल हो गया।कई दशकों तक चीन ने विकसित देशों का कचरा ढोया।उसे पुनः चक्रित कर कच्चा माल निकाला।उस से सस्ते उत्पाद तैयार किये।तीसरे विश्व देशों में जहां उच्च गुणवत्ता के महंगे उत्पाद लोगों की पहुँच से दूर थे वहां उन्हें उतारा गया।जब वहां से मुनाफा कमाया तो विकसित देशों में भी सस्ता सामान उतार दिया।अब जब एक स्तर पर आने के बाद ये औद्योगिक कचरा खुद के लिए ही मुसीबत बन ने लगा,तो इससे किनारा करना चालू कर दिया।कोरोना ने बड़ी बड़ी कंपनियों को घुटने पर ला दिया है।चीन की जिस जनता से मुनाफा कमाया गया।कभी उसे वो सुविधाएँ ही नहीं दी गयी।जिसके कारण श्रमिक वर्ग इस महामारी के आगे खड़ा हो ही नहीं पाया।बीमारी भी ऐसी की,वर्ग नहीं देखती।अब ये श्रमिक वर्ग जो की विकसित देशों के औद्योगिक और आर्थिक ढांचे की रीढ़ था वो ही भर भरा गया।
एक बार जापान के एक विद्वान 'केनिची ओहमें ने चीन के बारे में कहा कि"चीन पूंजीवाद को सबसे कच्चे रूप में प्रदर्शित करता है। ग्वांगझू में एक कारखाने के प्रबंधक को पता चलता है कि कुछ श्रमिकों की नज़र उनके द्वारा किए गए काम के परिणामस्वरूप बिगड़ती है। तो उन्हें एक सप्ताह के वेतन के साथ नौकरी से निकाल दिया जायेगा। वे अब उनकी जिम्मेदारी नहीं हैं।वहीं एक जापानी प्रबंधक को इस तरह का कार्य करने के लिए, वह कारावास का जोखिम उठाना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए ब्रिटेन की एक फर्म पर मुकदमा चलाया जा सकता है"।

भारत भी इस वैश्वीकरण के समय में अछूता नहीं रह सकता है।शेयर बाजार में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं।पर शेयर मार्किट में गिरावट से उन लोगों को मौका मिला जो भारी खरीदारी की राह देख रहे थे।इन खरीदारों ने शेयर मार्केट को थोड़ा सहारा दिया है। इस से बड़ी समस्या ये है कि देश में काम करने वाली जनसँख्या में 43 प्रतिशत लोग अपने घरों से दूर रह कर काम करते हैं।21 दिनों के तालाबंदी के पीछे का कारण ये भी अगर लोगों ने घबरा कर आवाजाही शुरू कर दी तो बीमारी को भयावह रूप लेते देर नहीं लगेगी।।देश में 12000 से ज्यादा ट्रेनें रोज चलती हैं।एक करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में यात्रा कर रहे होते हैं।अति पलायन की भयावह स्तिथि को रोकने के लिए ही साहसिक परन्तु कड़ा कदम सरकार को मज़बूरी में उठाना पड़ा।पर यहीं से नई समस्या भी शुरू होती है।दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों में दूर दराज की मेहनती मजदूर जनता पुरे दिन खटती है और रात में चौराहों पर फुटपाथ पर सोती है।इन लोगों की स्तिथि सबसे अधिक दयनीय है।ऐसे दिहाड़ी मजदूरों ने व्यापक तो नहीं कह सकते पर परिवहन व्यवस्था ठप होने के बाद पैदल ही घर जाना चालू कर दिया है।प्रशासन इस पर काम कर तो रहा है।देश के जिम्मेदार नागरिक भी राशन और भोजन सामग्री बाँटते देखे गए हैं।सरकार ने इस स्तिथि से निपटने के लिए आर्थिक मदद की घोषणा तो की है पर असंगठित क्षेत्र में मजदूरों की संख्या का आंकड़ा भी तय नहीं है।वहीं विदेशों में फंसे कामकाजी लोगों का भी बुरा हाल है।लोग घरों में बंद पड़े हैं।अब प्रवासियों को एयरलिफ्ट किया जा रहा है।पर गरीब दिहाड़ी मजबूर अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर पैदल निकल पड़े है।इनको कोई लिफ्ट नहीं देने वाला है।
जो समाज अपने विकसित गुणवत्ता का डंका बजाता हो उसे भी कोविड-19 ने नहीं छोड़ा।समाज का दोगलापन निकल कर बाहर आया है।चाहे विश्व की कोई भी सामाजिक व्यवस्था अपने विकास का कितना ही गुणगान कर ले परंतु विपत्ति के समय ही समाज की उन्नति की कठिन परीक्षा होती है।समाज को सफल बनाने में उसके सदस्यों यानि हमारी मुख्य भूमिका होती है।वो ऐसे की किसी भी स्तिथि,परिस्तिथि या किसी घटना को ले कर हमारा नजरिया क्या है।हम किसी भी छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी बात पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।ये कुछ ऐसी छोटी बातें होती हैं जिनका परिणाम छोटा दिखने में भले से हो परन्तु कई परिस्तिथियों में ये निर्णायक भी साबित हो सकता है।निर्णय गलत होगा या सही प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है।आइये फिलहाल के कुछ उदाहरणों से समझें।
कर्फ्यू के बाद गली में दबे आदमखोरों  ने दांत दिखा दिए।जी हां छोटे छोटे सामानों पर कालाबाज़ारी देखी गयी।हैण्ड सेनिटाइजर तक पर गोरख धंधा चला।ये सिर्फ भारत की बात नहीं है।ऐसे मास्क जो धूल तक न रोक पाए,महंगे दामों में मिल रहे हैं।अमेरिका में भी यही देखने को मिला।जिसको जैसे मौका मिला उसने जनता को नोंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी।नोटबंदी के दौरान 400 रुपये किलो नमक बिकने की बात याद आ गई।
हमें बोला गया कि देश में कोविड-19 की समस्या में हमारा सहारा बने शासकीय व् प्रबन्धकीय व्यवस्था तथा उस से जुड़े लोगों के लिए जनता कर्फ्यू वाले दिन शाम को ताली बजा कर या थाली पिट कर उनका मनोबल बढ़ाया जाए।पर इस मनोबल बढ़ाने वाली बात की जगह न जाने कब ताली और थाली की कंपन से वायरस के मरने की अफवाह ने जन्म ले लिया।पता ही नहीं चल पाया।देखते ही देखते 9 बजे समाप्त होने वाला जनता कर्फ्यू 5 बजे सामूहिक थाली पीटो अभियान में रूपांतरित हो गया।अहमदाबाद में तो लोग एक चौराहे पर जमा हो कर थाली पिट कर गरबा करने लगे।कुछ महानुभावो ने टिन टप्पर पिट पिट कर कोरोना के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।एक मोहतरमा ने तो थाली पीटी ही साथ में गो कोरोना के नारे लगाये।समाज में विकृत मानसिकता का दंश उत्तर पूर्व भारत के निवासियों को भी झेलना पड़ रहा है।उनका कसूर ये है कि वो दिखने में चीन के लोगों जैसे है।जबकि दोष देश के अनपढ़ लोगों का है जो की भूगोल में फ़ैल हो गए थे या रट्टा मार के या पैसे दे कर पास हुए थे।ये वही लोग हैं जो कि कम मजदूरी पर मजदूर खोजते हैं। फिर अविकसित और अर्धशिक्षित राज्यों से आया मजदुर जब इनके आस पास सफाई नहीं रख पाता तो उसे ही ये लोग गलियाते हैं।जबकि उसके इस जीवनस्तर के लिए यही लोग जिम्मेदार होते हैं।
बात यही नहीं थमी कई धर्म के ठेकेदारों ने गौ मूत्र के सेवन की बात कही।यहाँ तक कि एयरपोर्ट पर गौमूत्र रखवाने की बात सामने आयी।एक आचार्य ने तो गौमूत्र पार्टी तक रख दी।अब रुझान तो आने बनते थे।हुआ ये की देहरादून में एक ऐसी पार्टी के दौरान सेवनकर्ता को अगली सुबह तुल्ली लग गयी।उन्होंने आयोजक के खिलाफ FIR दर्ज करवा दी।वही एक धर्म गुरु तो बोले उनके दिमाग में फार्मूला आ चुका है।
ये सब बातें तो हुई समाज के जमीनी वर्गों की जो कि रोज कुआँ खोद कर पानी पीतें हैं।पर उनका क्या जिनके पेट भरें है?अरे भाई उन्होंने ने भी कोविड संकट में लोगों से हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा कर वंचना की कि महानुभावों घर में रहो।पर ये लोग दिल्ली के दंगों के दौरान क्यों नहीं बोले जब 52 लोग मारे गए।उसके पीछे है इनका वर्गवादी कीड़ा।जी हां क्योंकि जो लग मरे थे वो इनके काम के नहीं थे।याद रखियेगा जब जब मुसीबत आएगी ये उच्च कुलीन वर्ग सबसे पहले अपनी विलासी मांद में भागेगा।हुआ भी यही मांद में भागने में उपरांत याद आया,आना तो फिर बाहर है।इसी भोली भाली जनता के बीच।जिसे अशिक्षित रखने का फायदा तो मिला पर यही अशिक्षित जनता अर्थ का अनर्थ बनाते देर नहीं लगाएगी।अब मांद के अंदर से गीदड़ों ने हुंकार भरी कि "बाहर मत निकलो,वरना जब कभी हम बाहर आएंगे तो हमे भी कोविड 19 से कोरोना हो जायेगा।लेख कहीं से भी घर रहने के सन्देश का उपहास नहीं करता परतुं इन सन्देश दाताओं का मुखोटा निकालने का प्रयास जरूर करता है।
भारतीय समाज एक कहावत के लिए मशहूर है,कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता है।वो ऐसे कि 21 दिन के तालाबंदी की घोषणा के बाद भी समाज खलनायकों से भरा पड़ा है।लोग अभी भी घर के बाहर न जाने क्या चर रहे थे।अब बारी आई हमारी ग्वाला जैसी पुलिस की,जिसका एकमात्र हथियार ही लाठी डंडा है।लठ पिलाई के वो रुझान देखने को मिले की मन रह रह कर कौंध जाता है।ऐसा प्रतीत होता है कि थर्ड डिग्री में प्राण पखेरू उड़ने से ठीक पहले तक मारते होंगे।परन्तु ये पुलिस की सख्ती से ज्यादा मज़बूरी बनता दिखा।आखिर इस छुआछूत महामारी की वजह से उन्हें सड़कों पर नहीं खड़ा होना पड़ रहा है बल्कि समाज के गैर जिम्मेदार लोगों की वजह से वो बाहर हैं।वही लोग हैं कि मान ने को तैयार नहीं।कुछ विकलांग बुद्धियों की वजह से जरुरतमंद लोगों की भी पिटाई हो गयी।पर पुलिस वाले गरीब लोगों की सहायता करते हुए भी दिखे जोकि समाज में उनके दर्जे को बढ़ाएगा ही।ये वही समाज है जो सरकारी कंपनियों और सुविधाओं के निजीकरण की बात करता है परंतु समस्या के समाधान के लिए आज सरकारी ढांचे पर टकटकी लगाए घरों में बैठा है।स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के रक्षा क्षेत्र की अग्रणी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को 30 हजार वेंटीलेटर बनाने के आदेश जारी करें हैं।ये कंपनी देश सेवा में 1954 से समर्पित है।

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में,राजनितिक टिका टिप्पणी न हो,तब तक लेख को पूरा मान लेना गलत है।क्योंकि कोविड-19 से व्याप्त संकट में राजनितिक सफलताएं भी देखने को मिली तो वही राजनितिक विफलताएं भी दिखी।देश की ढांचागत मूलभूत सुविधाएं देश की राजनितिक सफलता का परिमाण सिद्ध होती हैं।जहां जापान,दक्षिण कोरिया,जर्मनी और कनाडा जैसे देशों ने अपनी जनता के प्रति वफ़ादारी को सिद्ध कर दिया।वहीँ चीन,ईरान,स्पेन और इटली की पोल खोल दी।ये मात्र 3 महीनों का खेल है।अभी ये समस्या भारत देश में अभी दूसरे चरण में हैं।परंतु एक बाद आते एक आदेशों से समस्या की विकटता का पता लग रहा है कि भारत के लिए किस हद तक बुरे हालात पैदा हो सकते हैं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार,18 जनवरी,2020 से 23 मार्च,2020 तक पंद्रह लाख के करीब प्रवासी भारतीय वापिस देश लौट आये हैं।*
वहीँ प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो,भारत सरकार के अनुसार 6 मार्च,2020 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में देखा गया कि 30 अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर 6.5 लाख प्रवासी भारतीयों की जाँच की जा चुकी है।**

यहाँ प्रति किलोमीटर में 400 लोगों का औसतन जनसंख्या घनत्व है।कुछ महानगरों में ये घनत्व राष्ट्रिय औसत से भी ज्यादा है। 0.5 बेड प्रति 1000 लोगों पर हैं।जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बेड की संख्या कम से कम 5 तो होनी ही चाहिए।वही डॉक्टर का अनुपात 0.8 है प्रति 1000 लोगों पर।जबकि इटली में डॉक्टर अनुपात पांच गुना ज्यादा है।***

समय अभी तो खराब है।पर खतरा टलने के बाद प्रश्न उठेंगे कि इतनी बड़ी संख्या की घोषणा का आखिर होता क्या है?धरातल पर कुछ दिखता नहीं?पर ये बात भी तय है कि भारतीय मीडिया घर की सबसे कुटिल बहु की तरह सब का ध्यान कहीं और ही मोड़ देगी और किसी को कुछ नहीं पता  चलेगा।
साथियों,इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड-19 संकट ने महा धुरंधर राष्ट्रों को अपने सामने शास्टांग प्रणाम करवा दिया।भारत जैसे विकासशील देश में ये समस्या भयावह रूप ले सकती है।इसे कोई दवा नहीं इसे सिर्फ और सिर्फ आप और हम रोक सकते हैं।आपकी घबराहट ही औरों का अनावश्यक फायदा भी बन रही है।जिन लोगों को इस अव्यवस्था में भी अपनी व्यवस्था पहले दिखती है वो नहीं सुधरने वाले हैं।सुधरना आपको और हमें है।समाज को आपको और हमें ही आगे ले जाना है।ये समस्या समाज को पीछे धकेल सकती है।इसलिए इस से लड़ने के हमें आगे नहीं आना हैं बल्कि घर में रह कर थोड़ा सा पीछे हट कर इसका सामना करना है।ये समस्या सड़कों पर उतर कर सामना करने की नहीं है।बल्कि इसका समाधान घर में साफ सफाई को ढाल बना कर लड़ने की युद्धस्तर तैयारी की मांग करता है।जब आप स्वच्छ भारत की बात कर सकते हैं तो उसे अपने आचरण में स्थापित करने से पीछे क्यों हटना।अपने बौद्धिक विवेक का उपयोग कीजिये और सतर्क रहिये सजग बनिए।



रविवार, 22 मार्च 2020

बृज होली

गुंजिया संग भांग चढ़ी तन मन में,
उमड़े लहर अबीर की गलीयन में,
मस्ती चढ़ी,अंग-अंग भरमायो है,
लागे बस गयो कान्हा मेरी अखियन में।

मिले बहुत दिन पे टोली से,
जीवन में भर गो रंग होली से,
जी ना भरो आज चाची , भाभी संग ठिठोली से,
रंग भर दियो कविता में बीरज की बोली से।


शुक्रवार, 13 मार्च 2020

#पीड़ित

पीड़ित,पीढ़ियों से पीड़ित रहा,
पीड़ाऔं का पीड़ित को पीढ़ियों बाद पता चला।
पीड़ाऔं से निकलने का भी पीड़ित को पीढ़ियों बाद पता लगा।
पीढ़ियों बाद पीड़ित,पीड़ाऔं से बाहर जा निकला।

पीढ़ियों बाद पीड़ित,पीड़ाऔं से निकल तो गया।
पर लग गया अपनी पीढ़ियों को बना ने में,
और पीढियां भी हैं उन्हें तो भूल गया।
भेद पता चल गया उसे पीड़ित बने रहने में।

अब बचा पीढ़ियों का जो पीड़ित है।
पता उसे,अपीड़ित तो अब अपीड़ित है।
पर अपीड़ित,पीड़ित को आगे कर रहा।
पीड़ित,अपीड़ित की पीड़ा के लिए लड़ रहा।

पीड़ा का खेल तो पीढ़ियों से चल रहा।
पीड़ित तो पीड़ित,अपीड़ित पीड़ित बन रहा।
अपीड़ित अब पीड़ा से नहीं लड़ रहा,
अपीड़ित,पीड़ित की पीड़ा से खेल रहा।

नितेश तिवारी

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

कहानी - डामर


                   
                                                           (1)
भारत एक विकासशील देश,जहां सदियों से विकास चल तो रहा है।जो कि आगे भी निरंतर चलता ही रहेगा।इस चलते रहने का कारण हम स्वयं हैं।क्योंकि हमें "चल रहा है न"देखना और सुनना दोनों पसंद है।
सुबह के 6 बज चुके है।केरल वाली आंटी जिन्हें पूरी बिल्डिंग मद्रासन आंटी के नाम से जानती है।ये कुछ ऐसा ही है कि जो मार्किट में चल फिर उसके बाद जो भी आएगा उसी नाम से पुकारा जायेगा।
जोर से ऊपर की और मुहँ करके दहाड़ती हैं,चोटु........ चोटु...........(अपनी केरल वाली हिंदी छोटू को चोटु)
सुनो,
हम्ममम्म
अरे उठो न।
क्या है?क्या दिक्कत है संडे है आज।
अरे! मद्रासन आंटी आज फिर गला फाड़ रहीं हैं।उठो देखो क्या हुआ।
चिल्लाने दो,अभी खुद चूप हो जाएंगी।
तुम से तो कुछ बोलना ही बेकार है।
हम्ममम्मम्म
हाँ आंटी जी,क्या हुआ।
नीरा देको, आज फिर पूरा रात से तुमारा कूलर से पानी टपका मेरा कूलर पे।
टप टप का आवाज आया पूरी रात मैं सो नहीं पाया।
आंटी मैं भेजती हूँ इनको।देखेंगे आज संडे है न।
वो कूच नहीं सुनता है,चोटु हमेशा ऐसा करता है।
पिचली बार बोला ता,तो मेरा कूड़े का बाल्टी,मेरे ही कपडे की रस्सी से कूलर के नीचे बांध दिया।मैं तीन दिन तक कूड़े का बाल्टी ढूंढती रही।फिर बरसात में जब कूड़ेदान का गंदा पानी मेरा कूलर पे गिरा तो मेरे को पता चला।
मैं उसी दिन उसको बोली तो बोलता है,कोई नहीं आंटी अब तक काम चल रहा था न,कुछ और देकेंगे।
अब काम नयी चलेगा,मेरे को उसका सोल्युशन चाहिए नहीं तो तुम कूलर हटाओ।बस आज लास्ट हैं,मेरी तरफ से।
..............…................

                                                              (2)
अरे! भगवान् के लिए अब तो उठ जाओ,कुछ सुना तुमने?
हाँ,यार सुन तो लिया आज कर दुंगा।
पहले इसे अपना बाहर वाला नाम बोलना सिखाऊंगा,फिर इसका मुँह सील करूँगा और फिर कूलर का।
अरे! चुप करो,सुन लेंगी।आखिर बचपन से देख रहीं हैं तो घर वाला नाम ही लेंगी न।
अरे! तो बुढ्ढन वो भी तो ठीक से नहीं ले पाती।
चुप करो और जाओ देखो,नहीं तो तुम कल दफ्तर होंगे, और ये मुझ पर चिल्लायेंगी।
कैसे चिल्लायेंगी?
तो पक्का न कूलर की लीकेज देख लोगे न?
नहीं,इसका मुहँ सील कर दूंगा न आज ही।
तुम जाते हो की नहीं।
जा रहा हूँ,बाबा कूलर तो चला दो,
नहीं चलेगा,उठो चुप चाप से.....
                       
                                                       (3)

टिंग तोंगग्ग्गग्ग
कौन?
आंटी मैं,सोमेश
ओह्ह चोटु।
हम्म्म्म  चोटुउउउउउउ।
(बिना गेट खोले)
मैं तुमसे परेशांन हूँ,तुम सुनते क्यों नहीं?
हाँ आंटी,अब आपको दिक्कत नहीं होगी।
तुम पिचली बार भी ऐसा ही बोला ता।
नहीं आंटी इस बार दिक्कत नहीं होगा।
(सामने रोड रोलर की आवाज आ रही थी,साल में दूसरी बार सड़क बन रही थी।)
सोमेश का ध्यान आंटी की बातों पे कम और रोड  से आती आवाज पर ज्यादा था।बिल्डिंग के बच्चों को आंटी की आवाज से भनक लग चुकी थी,सोमेश भैया आज शाफ़्ट एरिया में चरण रखेंगे और छत से जितनी बॉल नीचे गिरीं है उनके वापिस आने का टाइम आ गया है।
आंटी की अमर गाथा और अपने कर्मों का थोड़ा सा फल भोग कर सोमेश बाबू ऊपर आये तो देखा,आंतरिक खुरापाती मानुष को दबाये कुछ मासूम वानर,मेंन गेट पर याचक स्तिथि में खड़े हैं।
चाचू नमस्ते!
ह्म्म्म नमस्ते
आप कैसे हैं?
काम बोलो,चुप चाप से।
वो क्या है न कि, माही(सोमेश की ढाई साल की बेटी) की बॉल वहाँ कूलर के पीछे गिर गई थी।वो रो रही थी कल।
ये माही की बॉल तब ही क्यों गिरती है जब मैं  शाफ़्ट में जाता हूँ और वो मुझसे तो नहीं कहती?पर व्योमु तुझ से ही सब क्यों कहते हैं।कि उनका कोई सामान वहां गिरा है।तू बिल्डिंग का मुखिया है क्या?
नहीं,वो सब डरते हैं न आपसे।
अच्छा और तुझे डर नहीं लगता?
नहीं ऐसा नहीं है,वो मैं तो आपका सबसे ज्यादा सम्मान करता हूँ न।
(इस राजनितिक उत्तर के बाद कुछ शेष नहीं बचता था)
ह्म्म्म वो तो है।
                                               

                                                            (4)
सोमेश महाशय,लीकेज रोकने के सारे हतकंडे आजमा चुके थे,पर सासु माँ के प्यार से दिए कूलर का मोह छूट ही नही रहा था।आखिरकार,आज कुछ तो उपाय सोचना था।बुड्डन के प्रकोप से बचा जा सकता था,परन्तु गृह मंत्रालय से शाम को आते ही कारण बताओ नोटिस मिल सकता था।फिर से सड़क कार्य की आवाज कानों में गूंजी और बचपन की दादी माँ का जुगाड़ दिमाग में आ गया।
बचपन में दादी माँ गेंहू पछोरने वाले तीलियों से बने सूप में छोटे मोटे गैप को गर्म डामर से भर देती थी।माथा ठनका और महाशय जी तुरंत उठे,अधूरी बनी सड़क की और कूंच किया।वहां मजदूर खाना खाने के एक पेड़ के नीचे बैठे थे।महाप्रभु ने बिना किसी से पूछे, एक ड्रम से बहते थोड़े से गर्म डामर को एक पतरे के हिस्से पर जमा कर लिया और बुड्डन के घर की तरफ कूंच किया।चाल में आत्मविश्वास जोरों पर था।बड़ी ही तेजी से सवारी उनके गेट पर आके रुकी और बेल को इस तरह बजाया गया जैसे ट्रैन कूलर के नीचे से ही पकड़नी है।
अंदर से आवाज आई,कौन!
मैं आंटी, सोमेश।
ओह्ह चोटु!
(खिसियाई आवाज में धीरे से)
हाँ हाँ बुड्डन चोटूउउउउउ,पूरी दुनिया सिख जायेगी ये बुढ़िया नहीं सीखेगी।
(जोर से)
हाँ आंटी मैं ही हूँ।
(गेट पर आके)
इतना तेज बेल क्यों बजाया, आ रहीं थी न,बहरी नहीं मैं।
गुस्से की इतनी हिम्मत!जो आपके चेहरे पर आया?मैंने तो आज सुबह ही आपकी व्यवहार कुशलता के बारे में दो लोगों को बात करते सुना।
तुम हर बार ऐसा बात करके मेरे को बेवकूफ बनाता है,पर इस बार नहीं चलेगा।
क्या आंटी आपको भी अपनी तारीफ़ पसंद नहीं है।यही बात आपको सब से अलग करती है।
चोटु,बकवास बंद......लीकेज का क्या सोचा।
आंटी,अब चिंता मत करो।ऐसा इलाज सोचा है कि सालों की छुट्टी।
जल्दी करो,मेरे को जाना है कहीं।
बस अभी लो।
(आंटी के घर से होते हुए,शाफ़्ट एरिया की तरफ महाशय जी बढे ही थे कि ऊपर छत से याचना भरी आवाज़ आयी)
चाचा वो बॉल भी निकाल देना।
निकाल दूंगा,पहले इस मुसीबत से तो निपटने दे।
चोटु,तुमने कुछ कहा क्या?
नहीं आंटी,वो व्योमु से बात कर रहा था।
(आखिरकार सफ़ेद कूलर को कई जगह से श्याम वर्ण से रंजीत कर उसकी वेशभूषा ही बदल दी गयी।)
बीवी के सामने महाशय जी कॉलर ऊपर करते हुए घर में घुसे,जैसे सारागढ़ी की लड़ाई में सबको मार कर वही अंतिम बचे थे।
कुछ दिन के लिए शांति का वातावरण व्याप्त हो गया।जहाँ रोज आंटी से सुबह निकलते वक़्त मुँह छुपाया जाता था।अब उनका हाल चाल पूछे बिना नहीं निकलते बनता।
आसमान साफ था,तेज धूप ने नाक में दम कर दिया था।आंटी जी कूकरी शो की पक्की फैन थी।पता नहीं कब से अचार डालने का प्लान बनाये बैठी थी।धुप देख कर अचार डालने का निर्णय ले ही लिया।अब जब कच्ची अम्बिया सुखाने के बाद मिश्रण तैयार कर के उसे ठीक कूलर के नीचे आती धुप के नीचे दिया।वहां बंदर और बच्चों से सुरक्षा निश्चित थी।रविवार का दिन था।सामान्य दिन की तरह ही अचार को निश्चित जगह पर इस बार दक्कन खोल के रखा गया पर इस बार होनी को कुछ और ही मंजूर था।धुप ने डामर को कुछ लिस लिसा सा कर दिया था।बची खुची कसर सामने वाले खिड़की के टूटे शीशे की चौंध ने पूरी कर दी।
स्वादिष्ट अचार का मसालेदार रंग काला पड़ने लगा।
शाम हो चुकी थी,सोमेश बाबू ने चाय की बांग लगायी ही थी, अंगड़ाई लेते हुए कि नीचे से एक जोर से कर्कश भरी आवाज़ आयी।
चोटु उउउउउउउउउउ..............................।