बुधवार, 21 अगस्त 2024

बेकार जवानी

 बेकार जवानी

अगर धुम्रपान सही है।
तो छुप के पीना बैमानी है।
और फेफड़े फूंकना ही ट्रेंड है।
तो निरी बेकार ऐसी जवानी है।

दौलत की दौड़ में हो अंधी,
जिसे दिखावे की बीमारी है।
अन्याय पर आवाज हो मंदी,
निरी बेकार ऐसी जवानी है।

अरे ओस चख कर तो देखो।
ये नहीं मुफ्त का पानी है।
बरसात में जो नहीं भीगी।
निरी बेकार वो जवानी है।

पहाड़ों की और चल निकलो,
देखो कुदरत कितनी रूमानी है।
मोबाइल में जो गुम हो चुकी,
निरी बेकार ऐसी जवानी है।

किताबों से इश्क कर लो,
मिट जायेगी,जो बेताबी है।
सीरत छोड़,सूरत पर मरती हो,
निरी बेकार वो जवानी है।

नदियों के सहारे बहो तुम,
देखो दरिया में कितनी दीवानगी है।
दुनियादारी में हो जाए गुम,
निरी बेकार वो जवानी है।

ख़ून न खोलता हो जिसका,
जिसे डरने की बीमारी है।
खून,पसीना न हुआ एक जिसका,
निरी बेकार वो जवानी है।

निरी बेकार वो जवानी है।






मंगलवार, 12 सितंबर 2023

मेरी जान

बात कुछ खास बड़ी नहीं होती है।
रूह मेरी दूर खामोश खड़ी होती है।
हर खता मेरी आंखों में पढ़ लेती है।
वो बढ़ी आंखों से मेरी खबर लेती है।

आंखों में उसकी रंगीनियत ऐसी कि,
उसके आगे सारे नगीने फीके पड़ जाएं।
उसके चेहरे में है मासूमियत ऐसी कि,
दुनिया जहां के फरिश्ते भी पीछे पड़ जाएं।

मेरी गलतियों पर चुप रहती है।
उसके आंसुओं से तड़प जाता हूँ।
मुझसे कहीं बोलना बंद न कर दे।
मैं ये सोच कर भी घबरा जाता हूँ।

आंखें उसकी अलख जगा देती है।
मुझे जीने की वजह बता देती है।
मैं जब कभी वादे तोड़ देता हूँ।
प्यार भरे ताने दे के सजा देती है।

मैं थोड़ा बदमिजाज बेअदब हूँ।
वो बड़ी खुशमिजाज बाअदब है।
मैं उसकी मोहब्बत से भरा पड़ा हूँ।
पर वो मेरी मोहब्बत से लबा लब है।


शुक्रवार, 3 मार्च 2023

सरहज संग फगुआ

दईद सार के खलमुसर,सिल बट्टा,
पिसञs माल़ मसाला, भांगे क पत्ता,
चलs दुनऊ संघवा खेली फगुआ,
ए काल कचरहीं कुल कपड़ा लत्ता।

बता द मसाला तेल कहा बा,
न मिल्ई त, खोजञ का कहा बा 
आव तू हम खेली फगुआ,
बिसर जाई आज, के कहां बा।

ए तलई समोसा, कचरी,भजिया,
तू रसभंगा संघे ल नमकिनिया,
आव होई जाए खेल खेलनिया,
तोहईय लगाई अबीर बुकनिया।

सरऊ से घोंटवायी भंगिया,
फिर पिसवाई चटनी धनिया,
दे दना दन तू हम खेली फगुआ
छानी रसभंगा, चाट चटनियां।

अउर ऐ करेजा, तोहई बदे बा!

सुतारे लगवा ल रंग रंगनिया,
ढेर जिन नाच! नाच नचनिया,
ना त मुर्चा जाई कमर कलईयां,
हम बनी फगुआ, तू बनs फगुनिया।














शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

Ae Rahi

Ae Raahi tu jab chale Sadak par,
Dost milenge tujhe har pag par,
Na ummidi ka bojh rakh jami par,
Tu bas aitbaar kar har dost par.

Ae Raahi tu jab chale sadak par,
Milna Bichadna dastoor tera,
Aansoo poch dekh Dagar par,
Kismat fir milayegi sabse Manjil par,

Ae Raahi tu chale jab sadak par,
Jab kabhi ladkhadaye,
Na tike haath jab kisi Hum safar par,
Utha khada ho dekh Falak par,

Uthna hai tujhe Uss  se bhi upar, 
yehi mukaam rakh Jahan me,

Ae Raahi jab tu chale Sadak par....

DEDICATED TO ALL MY BEST BUDDIES 

#TJ

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

पत्नी परम धर्म

पत्नी परम धर्म
विवाह उपरांत मुझे आत्मज्ञान हुआ,
नेत्र खुल गए मेरे, मार्ग मेरा परमार्थ हुआ।
जब हुए तुम्हारे रौद्र विकट रूप के दर्शन।
तब जाके मेरा सौभाग्य चरितार्थ हुआ।

जीवन मे निकटता ज्यों ज्यों बढ़ी,
मेरी तो विकटता भी त्यों त्यों बढ़ी।
हे प्रिये, तुम अद्भुत हो, अद्वितीय हो,
तुमसे कैसा तर्क? तुम अविजित हो।

तुम अति गुणवती, बलवान हो।
सारी कलाएं तुमसे विद्यमान हैं।
मेरी विधि तुम, तुम ही विधान हो।
मेरा तुम्हें शास्टांग प्रणाम है।

हे प्रिये, तुम जितनी सुंदर हो।
ठीक उतना ही मैं बुद्धिमान हूँ।
विवाह उपरांत सत्य विदित हुआ।
तुम ही अतिकुशल सर्व शक्तिमान हो।



बुधवार, 7 सितंबर 2022

मानस उद्भव

महापिंडो का महापिण्डों से मर्दन,
ब्रह्मांड ने किया विनाशकारी कृन्दन।
महाप्रलयंकारी महाविस्फोट हुआ,
तब जाके सौर मंडल प्रस्फ़ुट हुआ।

सूर्य का प्रज्वलन, नवग्रह संस्कार हुआ।
मात्र पृथ्वी पर पंचतत्व का उद्गार हुआ।
प्राकृतिक साम्य से वातावरण हुआ प्रणीत,
धरती माँ का जीवन स्वप्न साकार हुआ।

जल से थल पर, थल से नभ पर,
जीवन का उद्भव फिर प्रचार हुआ।
विकसित हुए जीव जंतु और मानव,
जीवन से ही जीवन का प्रसार हुआ।

प्रकृति की विकास लीला भी परम् है।
सभी जीवों की श्रंखला में मानव चरम है।
बाकी जीवों का विकास ही सीमांत है।
जीवों में मात्र मानव की सीमा अनन्त है।












शनिवार, 18 जून 2022

नई दिल्ली में मिली थी

ये प्यार था, दो दिलों की हेरा फेरी थी।
ट्रेन की पों पों,भीड़ की जोराजोरी थी।
याद करो जब नई दिल्ली में मिली थीं।
न मैंने सुन न चाहा,न तुम कुछ कह रही थीं।

आलू पूरी की,तो समोसे की गरमाहट थी।
भरी गर्मी में भी दो दिलों में सरसराहट थी।
था तुमसे मिलना शुद्ध प्रचुर नई दिल्ली में।
भले खाने के हर सामान में मिलावट थी।

वेटिंग टिकट थे,हमें सीट की थी कहाँ फिकर।
मेरे दिल में दिमाग में था बस तुम्हारा जिकर।
याद करो जब तुम हमसे नई दिल्ली में मिलीं थीं।
जब अनजान नजरें एक दूसरे को देख फिसलीं थी।।

ऊपर वाले ने भी क्या चुन कर हमें मिलवाया था।
न तुम कुछ कह पाई थीं,न मैं कुछ सुन पाया था।
क्या बेहतरीन जोड़ी नई दिल्ली स्टेशन में मिली थी।
तुम बेचारी गूंगी थी, मेरे कानों पर सुना साया था।







मंगलवार, 18 जनवरी 2022

हाथ थामें रखना

कभी मैं सुनूँगा, तुम कहना,
कभी तुम सुन लेना मेरा कहना!
चलता रहेगा ये कहना सुन ना
बस तुम मेरा हाथ थामें रखना,

हों हवाएं सर्द चाहे जितनी,
तुम मेरी बाहों में बाहें रखना।
हों आंधियां तेज चाहे जितनी,
तुम हाथों में हाथ थामें रखना।

सांस का है सांस से नाता,
मेरी धड़कन बनके रहना,
मेरी रूह बन कर निभाना,
बस मेरा हाथ थामें रखना।

दूरियां होंगी तो मिटेंगी भी,
नज़दीकियों को समझना।
आंखे हैं तो सिसकेंगी भी,
बस मेरा हाथ थामें रखना।

दोनों जीवन का स्वाद चखेंगे,
तुम मेरी मिठास बनके रहना,
दोनों मिलकर खिचड़ी पकाएंगे,
तुम बस मेरा हाथ थामें रखना।

तुम हो मेरे दिल की रानी,
मुझे राजा बना के रखना,
होंगे राजकुमार राजकुमारी,
बस मेरा हाथ थामें रखना।



"नितेश तिवारी"

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

रफूकारी


                                     (1)

नवनिर्मित नाव अपने पोत से निकलने को तैयार थी। तभी चालक दल में कुछ हड़बड़ी और बोखलाहट हुई। बहुत प्रयासों के बाद पता लगा कि चालक दल की चिंता का कारण नाव में पानी आना था। परन्तु फीता कटने का समय निश्चित था। उसे टालना समझो कि एक्सन साहब का प्रकोप झेलना। 
पर सुगबुगाहट आखिर कब तक सिसकती!
एक्सन साहब को पता लगा तो तुरन्त सम्बंधित अधिकारियों को फोन की किसी अत्याधुनिक एप्लिकेशन पर आगामी आरोप प्रत्यारोप गोलमेज सम्मेलन में तलब कर लिया गया।
सभी अपने अपने प्रकोष्ठों में अपने कपकपाते हाथों में फोन पकड़े साहब के पहले प्रहार को झेलने के लिए ततपर थे।
तो सम्मेलन कुछ यूं शुरू हुआ!

एक्सन साहब: प्राप्त जानकारी के अनुसार नाव में अनुचित मात्रा से अधिक पानी पाया गया है। सम्बंधित विभाग आगे की जानकारी दें।

मुख्य निरीक्षक : महोदय प्रथम दृष्टया मेरे द्वारा किये गए                              औचक निरीक्षण से प्रतीत होता है कि नाव में पानी आ गया है।

एक्सन साहब : अच्छा तो आपने क्या एक्शन लिया।

मुख्य निरीक्षक : महोदय मुख्य फट्टी विभाग को सू चित्त                           कर दिया गया है। आप निश्चिंत रहे समिति दल को हमने भनक भी नहीं लगने दी है।

एक्सन साहब : वो बाद वाला काम अधिक प्रशंसनीय है।
                     फट्टी विभाग के चीफ बताए।

चीफ साहब : जानकारी मिलते ही रिसाव के निरीक्षण व रफू                     के लिए दल को रवाना कर दिया गया है। आगे की जानकारी मिलते ही अवगत करवाया जाएगा।

मुख्य निरीक्षक : गुप्त सम्पर्क सूत्रों के द्वारा प्राप्त सूचना के                        अनुसार समिति दल के प्रधान नाव की और प्रस्थान कर रहें हैं।

एक्सन साहब : चीफ साहब तुरन्त रफू दल को रोका जाए।

चीफ साहब : महोदय आपके आदेश से पूर्व कार्यवाही हो                        चुकी है रफू दल रिसाव के ऊपर ही लेट गया है तथा रफू दल के मुख्य रफुकर जो अभी संस्थान के कार्य से कहीं और रफू करने गए हैं उनसे हम निरन्तर सम्पर्क में हैं।

एक्सन साहब : मुख्य रफुकर को बोलो पैर आकाश की ओर                      करके और हाथों के बल चलकर आएं। छाती ठोक कर नाव को अंतिम रूप उन्होंने ही दिया था।

चीफ साहब : रिसाव की सूचना मिलते ही मुख्य रफुकर को तत्काल द्रुत गति से रवाना होने के आदेश दे दिए हैं।

मुख्य निरीक्षक : महोदय समिति के प्रधान जा चुके हैं।

चीफ साहब : मुख्य  रफुकर रिसाव स्थल पर अवतरित हो                       गया है तथा प्राप्त विशिष्ट विशेषज्ञता से परिपूर्ण जानकारी के अनुसार छेद की आशंका है,पूर्व विभाग के किये गए फट्टी संयोजन में।

मुख्य निरीक्षक : परन्तु पूर्व संयोजन दल द्वारा किये कार्य का                       निरीक्षण हमारा दल कर चुका है।तथा रिसाव तब नहीं था।

एक्सन साहब : सभी से परिणाम की उपेक्षा की जाती है,                           इस समय अवलोकन का समय नहीं है।
चीफ साहब मुख्य रफुकर से समस्या के निवारण में लगने वाले समय का अवलोकन करें।

चीफ साहब : मुख्य रफुकर ने सीना ठोकते हुए कार्य को तीव्र गति से तय समय पर करने की कसम खाते हुए, एक शाम, एक रात और एक दिन का समय मांगा है।

मुख्य निरीक्षक : परन्तु महोदय मेरे अनुसार रिसाव के लिए।

एक्सन साहब : आप चुप रहें, स्थिति का अवलोकन करने में                       बाधा न पहुँचाये, आप पूर्व विभागों से सम्पर्क करें तथा रिसाव का अवलोकन करें।

मुख्य निरीक्षक : परन्तु समिति दल का एक पूर्व                                  अधिकारी ही नाव पर मोहर लगा चुका है।

एक्सन साहब : हम्म्म्म चीफ साहब प्रतिक्रिया दें।

चीफ साहब : महोदय मेरी प्रतिक्रिया आ चुकी है। अनुभवी                       मुख्य रफुकर के औचक निरीक्षण पर वह आधारित है।

एक्सन साहब : समिति दल को बिना खबर लगे रिसाव                         रोका जाए।

चीफ साहब : महोदय मुख्य रफुकर दल ने नाव को अपने                        क्षेत्र में ले लिया है। रफू कार्य जारी है।

आरोप प्रत्यारोप गोलमेज सम्मेलन पर अल्प विराम!

                                      (2)
मुख्य रफुकर : महोदय लगता है रिसाव के आस पास की                          सारी फट्टीयां उखाड़नी पड़ेंगी। कार्य लंबे समय तक चलेगा, दल को पर्याप्त समय चाहिए नहीं तो ग्राहक सम्बन्धों, पोत की प्रतिष्ठा पर विपरीत असर पड़ेगा।
हम अपने प्रस्तावित लक्ष्यों से पिछड़ सकते हैं। 
समिति दल भी हमें गलत समझ सकता है। हमें पूर्व विभागों पर कड़ाई बरतनी होगी। हमें निरीक्षण दलों के भी कान ऐंठने होंगे। हम किसी भी हाल में इस रिसाव को छोटा नहीं समझना चाहिए। ये आने वाले भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। हमारा भविष्य वैसे भी खतरे में है। प्रतिस्पर्धियों से हमें खतरा है। वे हमारा काम छीन सकते हैं जिस से पोत का भविष्य खतरे में पड़ सकता है और......

मुख्य अभियंता : बीच मे रोकते हुए बोले पर यह रिसाव पूर्व                        में हुए निरीक्षण के बाद पाया गया है। अतः मुझे लगता है आपके द्वारा लगाए गए अंतिम फट्टे की मरम्मत से काम हो जाएगा।

मुख्य रफुकर : महोदय आप अभी नए हैं। हमारा अनुभव                          जो बोलेगा वो ही सही होगा। आप निश्चिंत रहें बस आप देखते रहिये हम अपने अथक प्रयासों से सब छेद कर देंगे ...... मतलब भर देंगे।

मुख्य अभियंता : ( रफुकर पर निर्भरता से विवशता के भाव                          लिए) ठीक है आप कीजिये।

देखते ही देखते छेद के आस पास के सभी फट्टे निकाल दिए गए और फट्टे निकलने से हुए छेदों को निरीक्षण दल ने भी औचक निरीक्षण किया।

मुख्य रफुकर : उफ्फ्फ मैंने इतना खराब कार्य सपने में भी                         नहीं देखा।

निरीक्षण दल : परंतु ये छेद तो उखाड़ी गयी फट्टे की किलों                        के भी हो सकते हैं।

मुख्य रफुकर : जी हो सकते हैं पर हैं नहीं।

निरीक्षण दल : परन्तु मुख्य छेद की रिपोर्ट .....

मुख्य रफुकर निरीक्षण दल को चुप करवाते हुए : 
 ओह फो! आप चिंता मत कीजिये वो कोई छेद है! छेद तो ये हैं इतने सारे अब हम ये सब ठीक कर देंगे। और चिंता मत कीजिये आप जहाँ कहेंगे आपकी बात भी रख लेंगे।

समय का उचित उपयोग करते हुए, रफुकर दल ने नाव को फिर से तैयार कर दिया है। मुख्य रफुकर ने एक बार फिर सीना ठोका, इधर एक्सन साहब, मुख्य निरीक्षक और चीफ साहब ने अपना माथा ठोका।
समिति दल फीता काटने के लिए हमेशा की तरह मुख्य रफुकर दल की तरह ततपर तथा समर्पित है।
  







 












रविवार, 12 सितंबर 2021

पत्रकार

लबों पे आग,आंखों खून होना चाहिए,
हमे वो दहाड़,अब वो ललकार चाहिए,
अब अंगारो के सेज से भी न डरे जो।
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।

कलम चले तो,अक्षरों में धार चाहिए,
प्रहार से दोफाड़ हों,वो घाव चाहिए,
इंक़लाबी कलम इतनी धारदार चाहिए,
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए। 
                                                        (नितेश तिवारी)
सियासतों की सियासती से रुकसती,
सियासत का नंगा खेल नहीं चाहिए।
नकेल कसे जो चाल चले सियासती,
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।
                                                         (नितेश तिवारी)
जन से,जन का,जन को राज चाहिए, 
तपिश,वो तपन,वो आवाज़ चाहिए,
खून में रवानगी,वो रफ्तार चाहिए।
आज इस देश को वो पत्रकार चाहिए।

नितेश तिवारी

बुधवार, 18 अगस्त 2021

जलन

जलन
अगर नहीं किसी को झुका सकते
तो आखिर लोग जलते क्यों हैं?
अगर नहीं किसी को देख सकते,
तो उस को इतना देखते क्यों है?

जब खुजली नहीं जाती है।
फिर भी आंखे मसलते क्यों हैं?
कुढ़न की बदनामी नहीं जाती है।
फिर भी कुढ़ने को बेबस क्यों है।

जलन खा जाती है इंसान को,
निगल जाती है,इंसानियत को,
दोमुंहे बनकर घूमना पड़ता है।
जन्म देती है,हैवानियत को।

ऐसे लोग जीवित नहीं होते।
अंदर से मर चुके होते है।
सीधे कुछ कह नहीं पाते,
ये लोग बहुत दोगले होते हैं।





मंगलवार, 17 अगस्त 2021

मिथ्या से चोरी


भनक तो उसको लगी थी,
पर देखती ही रह गयी थी,
शमा जला कर चला आया हूँ।
गजरे से महक ही चुरा लाया हूँ।

अशर्फियों से आशिक़ी थी उसको,
चाशनी बेस्वाद लगती थी उसको,
ज़िंदगी का जश्न मना के आया हूँ।
उसकी आशिक़ी ही चुरा लाया हूँ।

वो मिथ्या में जी रही थी,
मिथक भंग कर आया हूँ।
मर मर के जी रही थी।
उसकी मिथ्या चुरा लाया हूँ।

झरोखे से बाट जोहती होगी,
भीड़ में मुझे खोजती होगी।
सुखचैन उड़ा कर आया हूँ,
नैनों को ही चुरा लाया हूँ।

शनिवार, 8 मई 2021

Each night I remember

Each Night I remember,
When I was held your hand.
When we were on the beach.
we used to walk on the sand.

Each night I remember,
When I made mistake intentionally,
Then Your high level of temper.
Then I smile,used to get forgiveness instantly.

Each night I remember,
When you screamed on your pimple.
I convinced you in simple manner,
Leave it baby,See your dimple.

Each Night I remember,
Whatever heppens,Tired or bothered.
For give pleasure to each other.
We used to fall in love togethered.

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

सवाल पूछो!

आवाम प्यासी रही होगी,
पी के खून,मुँह न पोछे,
कोई तो ग़रज रही होगी,
जो कोई सवाल नहीं पूछे।

वज़ीर करता रहा मनमानी,
आवाम सहती रही बेईमानी।
थी किस नशे में,जो न सूझे,
तभी कोई सवाल नहीं पूछे।

अशर्फियाँ तो न बटीं थी,
खून से गलियां सनी थी,
ऐसे हालात पे भी न टूटे,
कोई सवाल नहीं पूछे।

मदार का सुरमा लगा लो,
जो आंख इतने पे न फूटे,
मौतों से सराबोर है शहर सारा,
जो अब भी सवाल न पूछे।

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

नीरो की बांसुरी

सांस लेने के लिए सांस कम पड़ गई,
नौजवानों तक की धड़कने थम गई।
वो बीच बीच मे जिक्र तो करता रहा,
पर नीरो गद्दी की फिक्र करता रहा।

मरघटों में लकड़ियां कम पड़ गई।
शव जलाने को जमीन कम पड़ गई।
वेदनाओं का ज्वालामुखी फटता रहा।
नीरो बातें इधर उधर की करता रहा।

धरती का सीना अर्थियों से लद गया,
प्रचण्ड अग्नि चिताओं से तप गया।
घाटों पर मौतों का मेला लग गया।
प्यारा नीरो जा कर मंच पर चढ़ गया।

कुछ तो मरे, कुछ को डर सताता रहा,
मृत्यु दानव सड़कों पर तांडव मचाता रहा,
काल एक एक कर सबको खाता रहा।
नीरो मौत की धुन बांसुरी पर बजाता रहा।

(जरूरी नहीं किसने लिखा है,जरूरी ये है कि क्यों और किसके लिए लिखा है।अपना नीरो आप चुनिए मैंने चुन लिया है।)

मुखौटा

डरता हूँ कहीं अपनों से पराया न हो जाऊं।
मैं बेबाक नहीं रहा,जो हर बात कह सकूँ।
डर जाता हूँ,जो अपनों से सताया जाऊं।
आईना नहीं,जो हर बात सच कह सकूँ।

किसी की कसौटी पर क्या परख करूँ?
अब तो खुद को परखना भूल गया हूँ।
अब मैं मेरे पैमानों का भी क्या करूँ?
एक ऐसे सांचे में ढाल दिया गया हूँ।

मैंने तो कब का सोचना ही छोड़ दिया हैं,
पर सोचने का नाटक अच्छा निभा लेता हूँ।
सब निजी उपज की राय पे चलते हैं।
उनकी उपज में कुछ अपना उपजा लेता हूँ।

जब देखता हूँ,अपनी ही गाने वालों को।
खुद तर्क और आंकड़ों को जला देता हूँ।
प्रणाम कर लेता हूँ,नौनिहाल ज्ञानियों को।
अपने अर्जित ज्ञान को स्वाहा कर देता हूँ।

चाभी गुमा चुका हूँ,खुली सोच की दूर कहीं।
तुम खुली बात करना,दबी सोच की हर कहीं।
मुझे खोजना हो,तो मिलुंगा अंधेरों में कहीं।
गलती से खोजने,मत लगना उजालों में कहीं।
नितेश तिवारी "रचनाकर"

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

नाटक : इब्लीस का जनाज़ा

       नाटक-इबलीस का जनाज़ा
पात्र:
1) इबलीस - मृत शरीर
2) वक्ता- सूत्रधार
3) कल्लू- हज्जाम
4) टांडे मियां - इबलीस के मित्र
5) चंदौसी बीबी - लखनऊ की रसूकदार महिला,इबलीस की पड़ोसन
6) मुख्तार : मुखिया,सरपंच
7) रक़ीब : चाय की दुकान वाले
8) साक़ी : मोहल्ले के जाने माने बीड़ी बाज
9) मंजूर : गांव का अन्य व्यक्ति
10) अनवरी और सरवरी -  चन्दौसी बीबी की चमचियाँ

प्रोप : 
रिकॉर्डिंग्स :1) बच्चे के रोने की आवाज़
2)घोड़ों और बन्दूकों की आवाज़
3) खपड़े के छत गिरने की आवाज़
4) नेता जी जिंदाबाद के नारे
5) आग लगने,भगदड़ की आवाज़
6) धरती फटने की आवाज़
7)भूकम्प में घर गिरने की आवाजें
कपड़े: 
1) बुर्के - 2
2) लेडीज सूट -1
3) टोपी और पठानी कुर्ता पजामा 
4) मुख्तार भाई : पटवारी सूट या कुर्ता पैजामा
मेकअप : सबने गहरा सुरमा लगाया हो।




वक्ता : इबलीस मिया के पैदा होते ही उनका रोना सुन कर दाई मां को मिर्गी का दौरा पड़ गया था।ये जिस रात पैदा हुए थे।उसी रात गांव में डकैती पड़ गयी थी।डाकू पूरे गांव को नंगा कर गए थे।इबलीस मियां के अम्मी और अब्बू पर छत गिर गयी थी और वो एक दूसरे को प्यारे तो थे ही ऊपर वाले को भी प्यारे हो गए।।गांव में जब पहली बार नेता आये थे तो लोगों को लगा बरक्कत होगी पर इबलीस मियां की बीड़ी को कहाँ गवाँरा था।कलमुँही ने नेता जी का स्टेज ही फूंक दिया।इबलीस मियां का दुर्भाग्य कहें या कुछ उनके कारनामें की,उनके गांव का हर आदमी 20 गज का फासला बना के रखता था।कुछ दिखने में तो थे ही अमावस के चांद जैसे।ऊपर से जुबान काली थी।गांव में सबसे उधार ले रखा था।
इबलीस मियां जीते जी किसी के प्यारे नहीं हो सके पर आखिरकार ऊपर वाले को प्यारे हो गये हैं।उनकी मनहूसियत इस कदर लोगों के सर चढ़ कर बोलती थी कि,अब आगे पीछे किसी के न होने की वजह से ज़नाज़े को ले जाने के लिए भी कोई आगे नहीं आ रहा है।
उनके प्रिय मित्र टांडे मियां जो कि इबलीस मियां की यारी के चक्कर में अपनी एक टांग गंवा चुके थे। ठहरे करारे मित्र ।अंतिम समय तक साथ नहीं छोड़ना चाहते थे।
           (1)
टांडे मियां: (रोते हुए)हाय मेरा हमदम मेरा दोस्त।मुझे छोड़ गया।अब मेरा निकाह कौन करायेगा?या ऊपर वाले ये कैसा जुल्म किया?मेरे दोस्त ने वादा अधूरा छोड़ दिया।
चंदौसी बी: अरे रो मत टांडे,बेचारा बहुत अच्छा आदमी था।रूह को जन्नत बक़्शे ऊपरवाला।
कल्लु: क्या चंदौसी बी जिंदा था,तो पेट भर के गाली देती थीं।आज अच्छा आदमी कहती हो।
चंदौसी बी:(आंखे तरेरते हुए)कल्लू! पेट तो मेरा अभी भी भरा हुआ है,तू कहे तो खाली कर दूँ ?
कल्लू: बी तुम गुस्सा हो जाती हो।तुम तो जानती ही हो मेरी जुबान फिसल जाती है।
चन्दौसी बी: दोबारा न फिसले! नहीं तो दुकान के किराए का तगादा बाकी है।
कल्लू : क्या बी ऐसे गमगीन मोके पर आप भी न,तौबा तौबा !
टांडे मियां : हाय मेरा लंगोटिया यार! पूरे गांव को अकेला छोड़ गया।
कल्लू : इसी में तेरी और पूरे गांव की भलाई थी।
(2)
मुख्तार : अरे! ज़नाज़े की तैयारी करो।चार आदमी आगे आओ।
कल्लू : चार आदमी! वही चार आदमी जो देखेंगे तो न जाने क्या क्या कहेगें?
मुख्तार : नहीं वो चार नहीं,उनकी खोज तो मैं खुद पैदाइश से कर रहा हूँ।अभी तक तो मिले नहीं।पर कल्लू ज़ुबान को सीधा भी रखा जा सकता है।
कल्लू : बड़े मियां आप ही ने चार आदमी बुलाये थे,तो उनके बारे में बताना तो बनता है।
मुख़्तार : क्यों रक़ीब भाई आपकी दुकान पर तो उठना बैठना था।आप तो आगे आएं।
रक़ीब : क्या ख़ाक आगे आएं,उधारी भी ले बढ़े मियां।
साक़ी : (बीड़ी का गश मुट्ठी से खींचते हुए)क्या मियां उधार वो भी तुमसे? बड़े हरफनमौला निकले इबलीस भाई।
रक़ीब : साक़ी तुझे बड़ी खुशी है!मेरा उधार मरने की?
साक़ी : (बीड़ी की राख चुटकी से झाड़ते हुए,रक़ीब की तरफ इशारा करते हुए)जो शक़्स अपना पसीना भी अपने पौधों पर छिड़के,उस से तो उधार लेना फन ही माना जायेगा।
रक़ीब : (साक़ी पर झपटते हुए)मुख़्तार मियां समझा लो साक़ी को, नहीं तो!
मुख़्तार : (बीच बचाव करवाते हुए)
साक़ी : (पतले हड्डल शरीर को कंपकंपाते हुए,बीड़ी पैरों से कुचलते हुए)नहीं तो क्या?जवानी में तेरे वजन के तो मुगदल घुमाये हैं मैंने।
चंदौसी बी : उधार तो मेरा भी था।पूरे 50 हजार।
गांव के और भी बोलते है,मेरा भी था,मेरा भी था।
(3)
मुख़्तार : अरे! ऊपर वाले से तो डरो।चुप करो तुम लोग।
चंदौसी बी : अरे कोई तो आगे आओ,ये क्या यहीं रखा रहेगा?(नाक सिकोड़ते हुए)
टांडे मियां : कोई आगे आये न आये मैं कंधा दूंगा मेरे दोस्त को।
कल्लू : वो तो ठीक है,टांडे मियां पर तुम्हारे कंधे पर कोई रखे तो सही।
टांडे मियां : हाय मेरा हमराही।खूद भी कुंवारा रह गया,मुझे भी कुंवारा छोड़ गया।अब लखनऊ की लड़कियों का क्या होगा?
कल्लू : जैसे इनके पीछे सारी बावली थीं।
चंदौसी बी : (पान दान से पान मुँह में दबाते हुए)मुख़्तार भाईजान सारा दारोमदार आप पर है,आप ही फैसला करो।
मुख़्तार : अपनी गांव में चुनाव होते ही आएं है,तो फैसला भी ऐसे ही हो।टांडे मियां राजी हैं।मुझे भी राजी होना ही पड़ेगा।बाकी आप लोग आपस में सलाह मशविरा करें।
कल्लू : सोच लो मुख्तार भाई जान आपको चुनाव जीताने का जिम्मा इबलीस भाई जान ने अपने कंधों पर लिया था।उस साल जमानत भी जब्त हो गयी थी आपकी।
और टांडे मियां तो बेकार ही एहसानों में दबे हैं।नहीं तो वो भी कौन सा तीन कोस तक उठा लेंगे?
मुख़्तार : (अजीब दुविधा में फंसते देख)कल्लू कह तो सही रहा है।
चंदौसी बी : अरे मुआ क्या ख़ाक ठीक कह रहा है?इस कलमुहे का बस चले तो ये पूरे लखनऊ में किसी की मय्यियत न उठने दे।
कल्लू : नहीं बी,आपको मैं सबसे पहले उठाऊंगा।
चंदौसी बी : हा हा मार दे मुझे,ताकि 6 महीने का किराया भी न देना पड़े।
कल्लू : क्या बी बात बात में तगादा करती हो।ये महामारी न होती तो वो भी दे देता।
चंदौसी बी : हां हां महामारी,जैसे तेरे यहां वैसे बड़ी लाइन लगती थी न ग्राहकों की।
कल्लू : क्यों भीड़ लगती नहीं थी।
चन्दौसी बी : हां लगती थी जब इंडिया पाकिस्तान का मैच होता था।
साक़ी : ये सब बातें छोड़ो।काम की बात करो।
अरे! जवानी में तो मैंने.....
कल्लू : (बात काटते हुए) हां हां पता है।साक़ी मियां तुमने जमाने भर की मय्यितें उठायी हैं।
साक़ी : अरे नहीं,मेरा मतलब......
रक़ीब : अरे जल्दी करों फैसला।
साक़ी : हां हां धंधे का टाइम जो हो रहा है।
रक़ीब : आंखे दिखाते हुए।
(4)
मुख़्तार : चुप करों, तुम लोग।अच्छा पर्ची ही डाल लो कम्बख्तों।
कल्लू : हां ये हुई न बात।इसलिए हर बार मैं मुख्तार भाई जान को वोट डालता हूँ।
रक़ीब : हाँ बिल्कुल मैं भी.......
साक़ी :  (रक़ीब की बात काटते हुए) हम्म तभी तो जमानत जब्त हो जाती है।
मुख़्तार : कल्लू बना पर्ची सब के नाम की।
चन्दौसी बी : आ हा हा ये मुआ अपना ही नाम नहीं डालेगा देखना।
कल्लू : (दांत निपोरते हुए),कैसी बात करती हो बी!
चन्दौसी बी : मैं पर्ची डालूंगी।
मुख्तार : ठीक है,मंजूर 
रक़ीब : मंजूर
साक़ी : मंजूर
टांडे मियां : मंजूर 
मुख्तार : (कल्लू की तरफ)कल्लू मंजूर?
कल्लू : मंजूर,मंजूर
मंजूर : हा आया! हां जी बोलो!
साक़ी : क्या बोलो?
मंजूर : जिस काम के लिए बुलाया है,वो बोलो।
मुख़्तार : अरे!तुझे किसने बुलाया?और तू हैं कौन?
मंजूर : जी हुजूर मैं मंजूर!
मुख्तार : अरे हमने तो हामी भरी थी।
कल्लू : तो क्या हुआ,आ ही गया है तो इसका नाम भी डलेगा।
मंजूर : नहीं!!!!!!!
सभी एक आवाज़ मे हां !!!!!!!!!!
(5)
चन्दौसी बी ने पर्ची बनाई।और ऊपर हवा में मुट्ठी ऊपर करके कलमा पढ़ा और जैसे ही हाथ हिलाया!जमीन जोर से हीली....
रक़ीब : साक़ी को पकड़ के अरे ये क्या ?कुछ महसूस हुआ ।
सभी एक आवाज़ में हाँ हुआ।
कल्लू : चन्दौसी बी! पर्ची फेंको।लेकिन अब की हिलाना मत।
चन्दौसी बी : ठीक है! कल्लू
अब जैसे ही पर्चियां जमीन पे गिरी,जमीन हिलने लगी।
टांडे मियां : (सबसे पहले भागते हुए)भागो जलजला आ गया।
कल्लू : भागो भूचाल।
भगदड़ मच जाती है,जमीन फटने की आवाज़।इबलीस भाई वहीं ज़मीन दोज हो जाते हैं।पूरा गांव तहस नहस तबाही।
कुछ मिनेट का सन्नाटा,लोग वापसी आते हैं।
मुख़्तार : बाप रे इतनी तबाही!ऐसा जलजला नहीं देखा।
कल्लू : हाय !(चन्दौसी बी को गिरा देख कर!)
 हाय! चन्दौसी बी हमें रोता बिलखता छोड़ गयीं।अब ये कल्लू किराया किसको देगा?
चन्दौसी बी : ( किराया सुन कर)किराया ! ला दे।
साक़ी : (चौंकते हुए) बुड्डन किराया सुन के जिंदा हो गयी।
कल्लू : (बात घूमाते हुए) अरे! ऊपरवाले ने मेरी सुन ली।
चन्दौसी बी : कलमुहे मुझे पता था।तू मरने पर भी किराया नहीं देगा।
रक़ीब मियां : अरे पर इबलीस की बॉडी कहां हैं?
साक़ी : क्यों बे उस से भी तगादा करेगा क्या?
कल्लू : अरे ! धरती में समा गई।
मुख़्तार : वाह ! रे इबलीस तेरा जनाज़ा,
            जीते जी न जीने दिया।
            मरते हुए भी सबकों ले बढ़ा।

बुधवार, 6 जनवरी 2021

अल्प विरह (शादी के बाद)

जाती हो जब कभी माईके तुम,
कुछ दिन सब अच्छा लगता है।
पर जब तुम नहीं होती हो घर में,
तो मुझे घर,घर सा नहीं लगता है।

मेरे सपने,मेरे अरमान,मेरे मज़ाक़,
सब कुछ अधूरा लगने लगता है।
चली जाती हो जब छोड़ कर मुझे,
अपना घर पराया लगने लगता है।

जाने के हफ़्ते भर बाद सब बेस्वाद लगता है,
जिस घर में रहता हूँ,यही होटल लगता है।
रहती हो,तो अकेले रहने का मन करता है।
पर अब यही अकेलापन खटकने लगता है।

एक छोटी चिड़िया भी है मेरे घरोंदे की,
जिससे मेरा घर संसार सब महकता है।
चली जाती है जब तुम्हारे साथ वो भी,
मेरी चौखट मेरा आंगन नहीं चहकता है।

तुम्हारी बाबुल की चाहत को समझता हूँ,
मुझसे वियोग की दुविधा भी समझता हूँ।
बाबुल से विरह की व्याकुलता समझता हूँ।
तुम्हारे हृदय के एक कोने में,मैं भी बसता हूँ।

मेरे घर आंगन में पायल फिर से झनका दो,
मेरे बगिया को पहले जैसा ही महका दो।
जैसा था मेरा जीवन,पहले जैसा ही बना दो,
अब आ भी जाओ,घर को फिर से घर बना दो।

कृति रचनाकार: नितेश तिवारी

रविवार, 13 सितंबर 2020

याद रखना

गहरी जान पहचान है आपसे,
खूद से दुर न समझने लगना।
कहीं दूर थोड़े ही गए है आपसे,
हमे अपनी यादों में याद रखना।

बनाये रखना ये खुशनुमा फितरत,
जहन में हमारा भी ख्याल रखना,
मिले नाती-पोतों से थोड़ी फुरसत,
तो हम लोगों को भी याद करना।

जब मांगों कुछ भगवान से,
भुला न देना हमे भूल से,
अपना खूब ख्याल तो रखना,
पर हमे दुआओं में याद रखना।






बुधवार, 24 जून 2020

मुफ्त का ज्ञान

ये जो तुम लडकियों के नार्मल से नार्मल पोस्ट पर भी वाहवाही करते हो न, शास्त्रों में ऐसे लोगों को ही "पिस्सू" कहा गया है।
 

ये जो तुम बचपन में साईकिल के पिछली पहिये का चैन उतर जाने पर उल्टा पैडल मारकर चैन चढ़ा देते थे, शास्त्रों में इसी को “टेलेंट” कहते हैं!
 

ये जो तुम पूरा ध्यान लगाकर पीछे के दांत में फंसे आम के रेशे निकाल लेते हो, शास्त्रों में इसी को “लगन” बताया गया है!
 

ये जो तुम बीवी के साथ होते हुए भी सामने से आती कन्या का कनखियों से स्कैन निकाल लेते जो, इसी गुण को शास्त्रों में “चपलता” कहा गया है!
 

ये जो आप 20 की सब्जी में भी लड़-भिड़ के मुफ्त की मिर्ची और धनिया ले आती हैं, इसी को सभी शास्त्रों में “धर्म की जीत” बताया गया है!
 

ये जो तुम नींद का बहाना बना के रूमपार्टनर और उसके गर्लफ्रेंड की बात रात भर सुनते रहते हो,
शास्त्रों में ऐसे ही बन्दों को “गुप्तचर” कहा गया है!
 

ये जो तुम सारे काम रोक के टीवी पे आ रहा हॉट सीन देखते हो ना.. इसी को शास्त्रों में “संयम” कहा गया है!
 

ये जो फैमिली ग्रुप में नॉनवेज जोक गलती से भेजने के बाद घुटने और कलेजे में सनसनी फील करते हो ना.. शास्त्रों में इसी को “भय” और “प्रलय का संकेत” कहा गया है!
 

ये जो बनियान तक अम्मा से धुलवाने वाले बंदे शादी के बाद कमोड साफ़ करने को मजबूर होते हैं ना..
अर्थशात्र में इसी को “अवमूल्यन” कहा गया है!
 

ये जो तुम खूबसूरत लड़की के चक्कर मे उसके सड़ियल भाई को दोस्त बनाते फिरते हो,इसे शास्त्रों में “गधे को बाप बनाना” कहा गया है !
 

ये जो तुम चंद लाइक पाने के लिए अपने फेसबुक पोस्ट पर 72 लोगों को टैग करते हो न, शास्त्रों में इसी को “लोभ” कहा गया है !

ये जो आप मेट्रो में सामने खड़ी आपकी ओर प्यार से देखती खूबसूरत कन्या के लिए भी अपनी सीट नहीं छोड़ते है.. इसे ही शास्त्रों में “मोक्ष” कहा गया है!