मंगलवार, 7 जनवरी 2020

कहानी - डामर


                   
                                                           (1)
भारत एक विकासशील देश,जहां सदियों से विकास चल तो रहा है।जो कि आगे भी निरंतर चलता ही रहेगा।इस चलते रहने का कारण हम स्वयं हैं।क्योंकि हमें "चल रहा है न"देखना और सुनना दोनों पसंद है।
सुबह के 6 बज चुके है।केरल वाली आंटी जिन्हें पूरी बिल्डिंग मद्रासन आंटी के नाम से जानती है।ये कुछ ऐसा ही है कि जो मार्किट में चल फिर उसके बाद जो भी आएगा उसी नाम से पुकारा जायेगा।
जोर से ऊपर की और मुहँ करके दहाड़ती हैं,चोटु........ चोटु...........(अपनी केरल वाली हिंदी छोटू को चोटु)
सुनो,
हम्ममम्म
अरे उठो न।
क्या है?क्या दिक्कत है संडे है आज।
अरे! मद्रासन आंटी आज फिर गला फाड़ रहीं हैं।उठो देखो क्या हुआ।
चिल्लाने दो,अभी खुद चूप हो जाएंगी।
तुम से तो कुछ बोलना ही बेकार है।
हम्ममम्मम्म
हाँ आंटी जी,क्या हुआ।
नीरा देको, आज फिर पूरा रात से तुमारा कूलर से पानी टपका मेरा कूलर पे।
टप टप का आवाज आया पूरी रात मैं सो नहीं पाया।
आंटी मैं भेजती हूँ इनको।देखेंगे आज संडे है न।
वो कूच नहीं सुनता है,चोटु हमेशा ऐसा करता है।
पिचली बार बोला ता,तो मेरा कूड़े का बाल्टी,मेरे ही कपडे की रस्सी से कूलर के नीचे बांध दिया।मैं तीन दिन तक कूड़े का बाल्टी ढूंढती रही।फिर बरसात में जब कूड़ेदान का गंदा पानी मेरा कूलर पे गिरा तो मेरे को पता चला।
मैं उसी दिन उसको बोली तो बोलता है,कोई नहीं आंटी अब तक काम चल रहा था न,कुछ और देकेंगे।
अब काम नयी चलेगा,मेरे को उसका सोल्युशन चाहिए नहीं तो तुम कूलर हटाओ।बस आज लास्ट हैं,मेरी तरफ से।
..............…................

                                                              (2)
अरे! भगवान् के लिए अब तो उठ जाओ,कुछ सुना तुमने?
हाँ,यार सुन तो लिया आज कर दुंगा।
पहले इसे अपना बाहर वाला नाम बोलना सिखाऊंगा,फिर इसका मुँह सील करूँगा और फिर कूलर का।
अरे! चुप करो,सुन लेंगी।आखिर बचपन से देख रहीं हैं तो घर वाला नाम ही लेंगी न।
अरे! तो बुढ्ढन वो भी तो ठीक से नहीं ले पाती।
चुप करो और जाओ देखो,नहीं तो तुम कल दफ्तर होंगे, और ये मुझ पर चिल्लायेंगी।
कैसे चिल्लायेंगी?
तो पक्का न कूलर की लीकेज देख लोगे न?
नहीं,इसका मुहँ सील कर दूंगा न आज ही।
तुम जाते हो की नहीं।
जा रहा हूँ,बाबा कूलर तो चला दो,
नहीं चलेगा,उठो चुप चाप से.....
                       
                                                       (3)

टिंग तोंगग्ग्गग्ग
कौन?
आंटी मैं,सोमेश
ओह्ह चोटु।
हम्म्म्म  चोटुउउउउउउ।
(बिना गेट खोले)
मैं तुमसे परेशांन हूँ,तुम सुनते क्यों नहीं?
हाँ आंटी,अब आपको दिक्कत नहीं होगी।
तुम पिचली बार भी ऐसा ही बोला ता।
नहीं आंटी इस बार दिक्कत नहीं होगा।
(सामने रोड रोलर की आवाज आ रही थी,साल में दूसरी बार सड़क बन रही थी।)
सोमेश का ध्यान आंटी की बातों पे कम और रोड  से आती आवाज पर ज्यादा था।बिल्डिंग के बच्चों को आंटी की आवाज से भनक लग चुकी थी,सोमेश भैया आज शाफ़्ट एरिया में चरण रखेंगे और छत से जितनी बॉल नीचे गिरीं है उनके वापिस आने का टाइम आ गया है।
आंटी की अमर गाथा और अपने कर्मों का थोड़ा सा फल भोग कर सोमेश बाबू ऊपर आये तो देखा,आंतरिक खुरापाती मानुष को दबाये कुछ मासूम वानर,मेंन गेट पर याचक स्तिथि में खड़े हैं।
चाचू नमस्ते!
ह्म्म्म नमस्ते
आप कैसे हैं?
काम बोलो,चुप चाप से।
वो क्या है न कि, माही(सोमेश की ढाई साल की बेटी) की बॉल वहाँ कूलर के पीछे गिर गई थी।वो रो रही थी कल।
ये माही की बॉल तब ही क्यों गिरती है जब मैं  शाफ़्ट में जाता हूँ और वो मुझसे तो नहीं कहती?पर व्योमु तुझ से ही सब क्यों कहते हैं।कि उनका कोई सामान वहां गिरा है।तू बिल्डिंग का मुखिया है क्या?
नहीं,वो सब डरते हैं न आपसे।
अच्छा और तुझे डर नहीं लगता?
नहीं ऐसा नहीं है,वो मैं तो आपका सबसे ज्यादा सम्मान करता हूँ न।
(इस राजनितिक उत्तर के बाद कुछ शेष नहीं बचता था)
ह्म्म्म वो तो है।
                                               

                                                            (4)
सोमेश महाशय,लीकेज रोकने के सारे हतकंडे आजमा चुके थे,पर सासु माँ के प्यार से दिए कूलर का मोह छूट ही नही रहा था।आखिरकार,आज कुछ तो उपाय सोचना था।बुड्डन के प्रकोप से बचा जा सकता था,परन्तु गृह मंत्रालय से शाम को आते ही कारण बताओ नोटिस मिल सकता था।फिर से सड़क कार्य की आवाज कानों में गूंजी और बचपन की दादी माँ का जुगाड़ दिमाग में आ गया।
बचपन में दादी माँ गेंहू पछोरने वाले तीलियों से बने सूप में छोटे मोटे गैप को गर्म डामर से भर देती थी।माथा ठनका और महाशय जी तुरंत उठे,अधूरी बनी सड़क की और कूंच किया।वहां मजदूर खाना खाने के एक पेड़ के नीचे बैठे थे।महाप्रभु ने बिना किसी से पूछे, एक ड्रम से बहते थोड़े से गर्म डामर को एक पतरे के हिस्से पर जमा कर लिया और बुड्डन के घर की तरफ कूंच किया।चाल में आत्मविश्वास जोरों पर था।बड़ी ही तेजी से सवारी उनके गेट पर आके रुकी और बेल को इस तरह बजाया गया जैसे ट्रैन कूलर के नीचे से ही पकड़नी है।
अंदर से आवाज आई,कौन!
मैं आंटी, सोमेश।
ओह्ह चोटु!
(खिसियाई आवाज में धीरे से)
हाँ हाँ बुड्डन चोटूउउउउउ,पूरी दुनिया सिख जायेगी ये बुढ़िया नहीं सीखेगी।
(जोर से)
हाँ आंटी मैं ही हूँ।
(गेट पर आके)
इतना तेज बेल क्यों बजाया, आ रहीं थी न,बहरी नहीं मैं।
गुस्से की इतनी हिम्मत!जो आपके चेहरे पर आया?मैंने तो आज सुबह ही आपकी व्यवहार कुशलता के बारे में दो लोगों को बात करते सुना।
तुम हर बार ऐसा बात करके मेरे को बेवकूफ बनाता है,पर इस बार नहीं चलेगा।
क्या आंटी आपको भी अपनी तारीफ़ पसंद नहीं है।यही बात आपको सब से अलग करती है।
चोटु,बकवास बंद......लीकेज का क्या सोचा।
आंटी,अब चिंता मत करो।ऐसा इलाज सोचा है कि सालों की छुट्टी।
जल्दी करो,मेरे को जाना है कहीं।
बस अभी लो।
(आंटी के घर से होते हुए,शाफ़्ट एरिया की तरफ महाशय जी बढे ही थे कि ऊपर छत से याचना भरी आवाज़ आयी)
चाचा वो बॉल भी निकाल देना।
निकाल दूंगा,पहले इस मुसीबत से तो निपटने दे।
चोटु,तुमने कुछ कहा क्या?
नहीं आंटी,वो व्योमु से बात कर रहा था।
(आखिरकार सफ़ेद कूलर को कई जगह से श्याम वर्ण से रंजीत कर उसकी वेशभूषा ही बदल दी गयी।)
बीवी के सामने महाशय जी कॉलर ऊपर करते हुए घर में घुसे,जैसे सारागढ़ी की लड़ाई में सबको मार कर वही अंतिम बचे थे।
कुछ दिन के लिए शांति का वातावरण व्याप्त हो गया।जहाँ रोज आंटी से सुबह निकलते वक़्त मुँह छुपाया जाता था।अब उनका हाल चाल पूछे बिना नहीं निकलते बनता।
आसमान साफ था,तेज धूप ने नाक में दम कर दिया था।आंटी जी कूकरी शो की पक्की फैन थी।पता नहीं कब से अचार डालने का प्लान बनाये बैठी थी।धुप देख कर अचार डालने का निर्णय ले ही लिया।अब जब कच्ची अम्बिया सुखाने के बाद मिश्रण तैयार कर के उसे ठीक कूलर के नीचे आती धुप के नीचे दिया।वहां बंदर और बच्चों से सुरक्षा निश्चित थी।रविवार का दिन था।सामान्य दिन की तरह ही अचार को निश्चित जगह पर इस बार दक्कन खोल के रखा गया पर इस बार होनी को कुछ और ही मंजूर था।धुप ने डामर को कुछ लिस लिसा सा कर दिया था।बची खुची कसर सामने वाले खिड़की के टूटे शीशे की चौंध ने पूरी कर दी।
स्वादिष्ट अचार का मसालेदार रंग काला पड़ने लगा।
शाम हो चुकी थी,सोमेश बाबू ने चाय की बांग लगायी ही थी, अंगड़ाई लेते हुए कि नीचे से एक जोर से कर्कश भरी आवाज़ आयी।
चोटु उउउउउउउउउउ..............................।

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

मानव एक दुमई

दुमई सुनने में कितना अजीब और गांव देहात का शब्द लगता है।उत्तर भारत के पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा आस पास के लोग इस से वाकिफ होंगे।असल में ये एक सांप की प्रजाति है।जिसके दो मुंह होते हैं,जोकि एक सामाजिक भ्रान्ति मात्र है।असल में,प्राकृतिक रूप से ही इसका पिछला भाग आगे वाले भाग की भांति ही प्रतीत होता है।इसे कुदरत ने इस छद्मावरण का रूपांतरण इसकी सुरक्षा के लिए दिया है।अब दोमुहें सांप का उच्चारण आज रूपांतरित होते-होते "दुमई" हो गया है।अब आप सोच रहे होंगे कि ये लेख आपको किसी जैव वैज्ञानिक खोज की और ले जायेगा पर ऐसा बिल्कुल नहीं हैं।अन्य प्राणियों की क्या चर्चा करना जब मनुष्य ही अपने आप में दुर्लभ प्राणी है।
"मनुष्य एक सामाजिक जंतु है" इसे समझ पाना मेरे लिए कठिन था।परंतु खुद मानव होकर मानवों के साथ रहते रहते मैं भी जंतु बन गया।अब ये बात धीरे धीरे  समझ पा रहा हूँ।पहले मैं मात्र मानव था,अब मैं सामाजिक जंतु हूँ।
मनुष्य एक सामाजिक जंतु तो था ही जिसमें सभी जंतुओं के गुण विद्यमान थे।पर अब दुमई सांप का गुण भी उसने हर लिया है।पर मानव अतिउत्तम किस्म का दुमयी है।हमारे अंदर समय देख कर अपना विचार और तो और स्वभाव बदल देने की कला है।ये बात अगर किसी दुमयी को किसी तरह पता लग गयी तो,अपनी अयोग्यता की ग्लानि से वो आत्महत्या कर लेगा।
जब जागो तभी सवेरा की कहावत पर हम इतने अटल हो गए हैं कि,जैसे ही देश में शासन बदलता है हम सजग हो जाते हैं।सुचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आयी क्रांति के बाद,तो हम देशद्रोहियों का चयन,मूल्यांकन और दंड निर्धारण भी घर बैठे ही कर लेते हैं।ये भी हमारे सुचना प्रौद्योगिकी की क्रांति से पहले और बाद के बदले हुए रूप को प्रदर्शित करता है कि सामाजिक प्राणी ने  दुमई के गुण को भी आत्मसात कर लिया है।यानि कि,हम पहले कुछ और थे आज कुछ और दिखते हैं।डार्विन के विकासवाद के नियम को भी सिद्ध करता है।क्योंकि हमारा मानसिक रूपांतरण हो चूका है।हम निरंतर रूपांतरण की और बढ़ भी रहे हैं।न जाने कब हम क्या बन जाएं।
मानव निरन्तर पहले से अधिक दक्ष होता जा रहा है।पौराणिक काल में मनुष्य वर्षों के तप के बाद इंद्रिय ज्ञान व् अवचेतन मन को समझ पाता था परन्तु आज के दौर में एक रंगीन फोटो पर लिखी दो पंक्तियां हमारी ज्ञानेन्द्रि को जाग्रत कर देती हैं।हम तुरंत अपनी संचार शक्तियों से उन पंक्तियों को संपूर्ण विश्व में पहुंचा देते हैं।अब हम घर बैठे देश विदेशी में हो रही वैश्विक घटनाओं तथा अपने ही देश में चल रहे राजनितिक भूचालों पर अपनी अतार्किक सटीक राय दे देते हैं।हम पहले धर्म की बात न करने वाले को नास्तिक समझते थे।पर अब तो दूसरे धर्म के लोगों से भी अपने धर्म के नारे लगवा कर उनकी हाथों हाथ घर वापसी करवा देते हैं। इसमे कोई समस्या आती है तो उन्हें जीवन मरण के बंधन से ही मुक्त कर देते हैं।पर पहले ऐसा नहीं था,क्योंकि प्रतिदिन शाम को न्यूज चैनल्स पर आने वाले आक्रांताओ का आधारभूत रूपांतरण नहीं हुआ था।ये आक्रांता मुझे अमरत्व प्राप्त बुद्धिजीवियों का अतिविकसित व् अतिशिक्षित महा मानवीय अवतार प्रतीत होते हैं।ये जब जब बोलते हैं,ऐसा प्रतीत होता है कि धरती पर कभी भी ब्रह्मांड के बाहर से हमला हो सकता है।ऐसा इसलिए है क्योंकि ये दूरदर्शी आधुनिक प्रत्यक्षदर्शी हमारे शुभचिंतक हैं।ये हमें आने वाली समस्या से पहले ही अवगत कर देते हैं।संपूर्ण जंतुजाति पृथ्वी के अंत तक इनकी ऋणी रहेगी।
असल में हमारे इस क्रांतिकारी वज्रबुद्धि मानव की आधारशिला रखने का श्रेय तो मुख्य रूप से इन्ही परम प्रजातियों को जाना चाहिए।ये ही हमारे अंदर के कलंदर के जन्मदाता हैं।हमने इनसे खल दल लेकर सामने वाले की छाती पे चढ़ जाने का हुनर सीखा,वो भी तब जब वो हमारी बात मान न रहा हो।हमने जोर जोर से चिल्ला कर,अपनी अतार्किक बात को भी सिद्ध करने की परम विद्या इन्ही लोगों से प्राप्त की।यदि आज इन अनन्य महापुरुषों को परमाकार सर्वज्ञाता की श्रेणी में रखूं तो ये इनके लिए अतिश्योक्ति न होगी।इन्ही लोगों ने हमें हमसे अवगत करवाया।ऐसी परम शक्तियों को हमें एक टांग पर खड़ा होकर फिर धरती पर लेट कर प्रणाम करना चाहिए।
अब हमारे बीच उपस्थित प्रेरणा स्रोतों से फिर से आपको मानवों,माफ़ कीजियेगा जंतुओं की तरफ ले चलता हूँ।इन महापुरुषों पर फिर किसी लेख में चर्चा होगी।इस बात को अन्यथा लेने वाले अन्यथा ही लें क्योंकि मुझ जैसे सामाजिक जंतु से आप और क्या आशा कर सकते हैं।
पर हम आज भी सीधे साधे हैं,जो की हमारे बीते 70 वर्षों के हमारी पिछली पीढ़ियों के देशद्रोह का परिणाम है।अब आप गुस्सा करेंगे कि पिछली दो पीढियां देश द्रोही कैसे?लेख के अंतिम में समझाता हूँ।हम सीधे साधे इसलिए हैं क्योंकि नमक के महंगा होते ही तेल महंगा हो जाता है।जब तक हम नमक का आकलन करते हैं।बात तेल पर पहुँच जाती है।अब तेल की बात शुरू ही की होती है कि ऊपर वाला कहाँ रहेगा इसकी चिंता घर कर लेती है।इस से पता चलता है कि हमारे रूपांतरण के साथ हमारी समस्याएं भी बढ़ी हैं।अब हम समस्याओं से घिरे सामाजिक जंतु है।
अब लेख का अंत में बिना किसी तर्क के अपनी अतार्किक बात को सिद्ध करूँगा कि आज़ादी के बाद की दो पीढियां घोर देशद्रोही थी।जी हां ये सत्य है।वो ऐसे कि हम अपने पिछले बीते वर्षों की सरकारों को देशद्रोही कहते हैं पर इनको चुन ने वाली हमारी पिछली पीढियां ही तो थी।पर अगर आप ऐसा नहीं मानते तो उन्हें कम से कम निर्बुद्धि तो कहिये ही।क्योंकि जो हमको जीवन का पाठ पढ़ाते हैं वो खुद अपने शासकों का चयन ठीक से नहीं कर पाए।अब दो में से एक संज्ञा तो आपको उन्हें अपने परम ज्ञान की आधार पर देनी ही होगी।
पर यहाँ पर एक अंतर्विरोध पैदा हो जाता है कि ऐसी पीढ़ियों की उत्पत्ति हम जैसा बुद्धिजीवी वर्ग कैसे हो सकता है?जो की आज़ादी जैसे बड़े क्रांतिकारी बदलाव के बाद फिर से 70 वर्षों के लिए देशद्रोही या निर्बुद्धि बन गयी।परन्तु यहां ये सिद्ध होता है कि प्रकृति के शास्वत नियमों से हम बंधे हुए थे इसलिए हम उन्ही के रूपांतरण का परिणाम हैं।जो की मेरे अनुभव से श्रेष्ठ पीढ़ी हैं।मुझे गर्व हैं कि मैं इस विकसित पीढ़ी का ही भाग हूँ।
इस लेख को लिखने के बाद में स्वयं को बहुत गौरान्वित अनुभव कर रहा हूँ।आशा है,आप भी इस लेख को पढ़ कर स्वयं की महानता को अनुभव कर रहे होंगे।






शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

#बेटियाँ

ओस की बूंद सी होती है बेटियाँ,
स्पर्श खुरदरा हो,तो रो देती बेटियां।
रौशन करेगा बेटा एक कुल तो,
दो कुलों की लाज होती हैं बेटियाँ।
कोई नहीं होता एक दूसरे से कम,
मोती अगर बेटा, तो हीरा होती बेटियाँ।
काँटों की राह पर खुद चलती रहती,
औरों की राह में फूल बो देती बेटियां।
विधि का विधान है,यही दुनिया की रस्म,
मुठ्ठी में भरे नीर सी होती हैं बेटियां।
संसार ने ये कैसी रीत है बनाई,
अपनी होते भी पराई होती हैं बेटियां।

विजेता

आसमान को छुआ उसने,
धरती का सीना चीरा जिसने,
उठाया पहाड़ों को तोड़ने का बीड़ा है।
उद्गगम का नीर पीया ही उसने।

किंतु,परन्तु,अगर,मगर,
ये सब रास्ते का रोड़ा है।
जिसने नदियों का मुँह मोड़ा है,
उसी ने लक्ष्यों को झकझोरा है।

न रुकने वालों को रोका किसने?
क्योंकि वो रोके कहाँ रुकते है।
इनकी मुट्ठी में है सारा जहाँ,
रास्ते में हर चट्टान को पिसा वहां।

टक्कर झेल उठायी जिसने पीड़ा है,
आसमान की बुलंदियों को छुआ उसने,
जिसने धरती का सीना चीरा है।

अंजान सफर

आखिर हम कहाँ जा रहे हैं?
क्या किसी को खबर है?
या फिर बस चले जा रहे हैं?
सफर भी कितना अजीब है।
गिरहबान तो अपना गन्दा है,
उंगली दूसरों पर उठा रहें है।
हमारी आस्तीन के सांप,
हमारी इंसानियत गटके जा रहे हैं।
हम तो खुद नहीं जानते,
कि हम कहाँ जा रहे हैं?
बस चले जा रहें हैं,
चले जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं।

विवाह (2007)

ये जीवन मात्र एक संरचना है,
जो विवेक से जिया तो ठीक।
और विवाह कर लिये तो दुर्घटना है,
विवाह बाद,तो जीवन को खींचना है।

ये यमराज की पाप भोगी पुस्तक की,
सुविस्तृत प्रयोगतात्मक विवेचना है।
सब सोचते,शादी जीवन को सींचना है,
पर ये,अपने हांथों से अपनी गर्दन भींचना है।

जागो पुरुषों,पुरुषार्थ करो,
जीवन में जो करना है करो,
पर भूल कर भी विवाह न करो।
विवाह न करो,विवाह न करो।



अपने से लगने लगे हैं। (दिसम्बर,2008)

न जाने क्यों अजीब से ख्याल आने लगे हैं,
दरिया,दरख़्त,नदियां,नज़ारे अपने लगने लगे हैं।
उन्हें देखकर लगा सदी गुजर गई थी अकेले,
न जाने क्यों वो पराये से,पर अपने लगने लगे हैं।

दिल चाहता है,उनके लिए दुनिया से लड़ने को,
न जाने क्यों हमें वो लगते अपने सगे हैं।
छीन लेने को जी चाहता है उन्हें उनसे ही,
वो कुछ पराए से, पर अपने लगने लगे हैं।

बिन बसंत के बाग़ में नई कोंपलें फूटने लगी है,
न जाने क्यों जागती आँखों में सपने पलने लगें हैं।
न चाहते हुए भी आँखें आंखों से मिलने लगी हैं।
न जाने क्यों वो पराये से ,पर अपने लगने लगे हैं।

रोज़ उनसे बात करना नहीं आदत बनाई अपनी,
पर फिर भी दुनिया हमें रोक कर हमसे कहती है!
आप सुधरेंगे नहीं आदत से मजबूर लगने लगे हैं।
न जाने क्यों वो पराये से ,पर अपने लगने लगे हैं।