आसमान को छुआ उसने,
धरती का सीना चीरा जिसने,
उठाया पहाड़ों को तोड़ने का बीड़ा है।
उद्गगम का नीर पीया ही उसने।
किंतु,परन्तु,अगर,मगर,
ये सब रास्ते का रोड़ा है।
जिसने नदियों का मुँह मोड़ा है,
उसी ने लक्ष्यों को झकझोरा है।
न रुकने वालों को रोका किसने?
क्योंकि वो रोके कहाँ रुकते है।
इनकी मुट्ठी में है सारा जहाँ,
रास्ते में हर चट्टान को पिसा वहां।
टक्कर झेल उठायी जिसने पीड़ा है,
आसमान की बुलंदियों को छुआ उसने,
जिसने धरती का सीना चीरा है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें