गुरुवार, 26 सितंबर 2019

मानव एक दुमई

दुमई सुनने में कितना अजीब और गांव देहात का शब्द लगता है।उत्तर भारत के पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा आस पास के लोग इस से वाकिफ होंगे।असल में ये एक सांप की प्रजाति है।जिसके दो मुंह होते हैं,जोकि एक सामाजिक भ्रान्ति मात्र है।असल में,प्राकृतिक रूप से ही इसका पिछला भाग आगे वाले भाग की भांति ही प्रतीत होता है।इसे कुदरत ने इस छद्मावरण का रूपांतरण इसकी सुरक्षा के लिए दिया है।अब दोमुहें सांप का उच्चारण आज रूपांतरित होते-होते "दुमई" हो गया है।अब आप सोच रहे होंगे कि ये लेख आपको किसी जैव वैज्ञानिक खोज की और ले जायेगा पर ऐसा बिल्कुल नहीं हैं।अन्य प्राणियों की क्या चर्चा करना जब मनुष्य ही अपने आप में दुर्लभ प्राणी है।
"मनुष्य एक सामाजिक जंतु है" इसे समझ पाना मेरे लिए कठिन था।परंतु खुद मानव होकर मानवों के साथ रहते रहते मैं भी जंतु बन गया।अब ये बात धीरे धीरे  समझ पा रहा हूँ।पहले मैं मात्र मानव था,अब मैं सामाजिक जंतु हूँ।
मनुष्य एक सामाजिक जंतु तो था ही जिसमें सभी जंतुओं के गुण विद्यमान थे।पर अब दुमई सांप का गुण भी उसने हर लिया है।पर मानव अतिउत्तम किस्म का दुमयी है।हमारे अंदर समय देख कर अपना विचार और तो और स्वभाव बदल देने की कला है।ये बात अगर किसी दुमयी को किसी तरह पता लग गयी तो,अपनी अयोग्यता की ग्लानि से वो आत्महत्या कर लेगा।
जब जागो तभी सवेरा की कहावत पर हम इतने अटल हो गए हैं कि,जैसे ही देश में शासन बदलता है हम सजग हो जाते हैं।सुचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आयी क्रांति के बाद,तो हम देशद्रोहियों का चयन,मूल्यांकन और दंड निर्धारण भी घर बैठे ही कर लेते हैं।ये भी हमारे सुचना प्रौद्योगिकी की क्रांति से पहले और बाद के बदले हुए रूप को प्रदर्शित करता है कि सामाजिक प्राणी ने  दुमई के गुण को भी आत्मसात कर लिया है।यानि कि,हम पहले कुछ और थे आज कुछ और दिखते हैं।डार्विन के विकासवाद के नियम को भी सिद्ध करता है।क्योंकि हमारा मानसिक रूपांतरण हो चूका है।हम निरंतर रूपांतरण की और बढ़ भी रहे हैं।न जाने कब हम क्या बन जाएं।
मानव निरन्तर पहले से अधिक दक्ष होता जा रहा है।पौराणिक काल में मनुष्य वर्षों के तप के बाद इंद्रिय ज्ञान व् अवचेतन मन को समझ पाता था परन्तु आज के दौर में एक रंगीन फोटो पर लिखी दो पंक्तियां हमारी ज्ञानेन्द्रि को जाग्रत कर देती हैं।हम तुरंत अपनी संचार शक्तियों से उन पंक्तियों को संपूर्ण विश्व में पहुंचा देते हैं।अब हम घर बैठे देश विदेशी में हो रही वैश्विक घटनाओं तथा अपने ही देश में चल रहे राजनितिक भूचालों पर अपनी अतार्किक सटीक राय दे देते हैं।हम पहले धर्म की बात न करने वाले को नास्तिक समझते थे।पर अब तो दूसरे धर्म के लोगों से भी अपने धर्म के नारे लगवा कर उनकी हाथों हाथ घर वापसी करवा देते हैं। इसमे कोई समस्या आती है तो उन्हें जीवन मरण के बंधन से ही मुक्त कर देते हैं।पर पहले ऐसा नहीं था,क्योंकि प्रतिदिन शाम को न्यूज चैनल्स पर आने वाले आक्रांताओ का आधारभूत रूपांतरण नहीं हुआ था।ये आक्रांता मुझे अमरत्व प्राप्त बुद्धिजीवियों का अतिविकसित व् अतिशिक्षित महा मानवीय अवतार प्रतीत होते हैं।ये जब जब बोलते हैं,ऐसा प्रतीत होता है कि धरती पर कभी भी ब्रह्मांड के बाहर से हमला हो सकता है।ऐसा इसलिए है क्योंकि ये दूरदर्शी आधुनिक प्रत्यक्षदर्शी हमारे शुभचिंतक हैं।ये हमें आने वाली समस्या से पहले ही अवगत कर देते हैं।संपूर्ण जंतुजाति पृथ्वी के अंत तक इनकी ऋणी रहेगी।
असल में हमारे इस क्रांतिकारी वज्रबुद्धि मानव की आधारशिला रखने का श्रेय तो मुख्य रूप से इन्ही परम प्रजातियों को जाना चाहिए।ये ही हमारे अंदर के कलंदर के जन्मदाता हैं।हमने इनसे खल दल लेकर सामने वाले की छाती पे चढ़ जाने का हुनर सीखा,वो भी तब जब वो हमारी बात मान न रहा हो।हमने जोर जोर से चिल्ला कर,अपनी अतार्किक बात को भी सिद्ध करने की परम विद्या इन्ही लोगों से प्राप्त की।यदि आज इन अनन्य महापुरुषों को परमाकार सर्वज्ञाता की श्रेणी में रखूं तो ये इनके लिए अतिश्योक्ति न होगी।इन्ही लोगों ने हमें हमसे अवगत करवाया।ऐसी परम शक्तियों को हमें एक टांग पर खड़ा होकर फिर धरती पर लेट कर प्रणाम करना चाहिए।
अब हमारे बीच उपस्थित प्रेरणा स्रोतों से फिर से आपको मानवों,माफ़ कीजियेगा जंतुओं की तरफ ले चलता हूँ।इन महापुरुषों पर फिर किसी लेख में चर्चा होगी।इस बात को अन्यथा लेने वाले अन्यथा ही लें क्योंकि मुझ जैसे सामाजिक जंतु से आप और क्या आशा कर सकते हैं।
पर हम आज भी सीधे साधे हैं,जो की हमारे बीते 70 वर्षों के हमारी पिछली पीढ़ियों के देशद्रोह का परिणाम है।अब आप गुस्सा करेंगे कि पिछली दो पीढियां देश द्रोही कैसे?लेख के अंतिम में समझाता हूँ।हम सीधे साधे इसलिए हैं क्योंकि नमक के महंगा होते ही तेल महंगा हो जाता है।जब तक हम नमक का आकलन करते हैं।बात तेल पर पहुँच जाती है।अब तेल की बात शुरू ही की होती है कि ऊपर वाला कहाँ रहेगा इसकी चिंता घर कर लेती है।इस से पता चलता है कि हमारे रूपांतरण के साथ हमारी समस्याएं भी बढ़ी हैं।अब हम समस्याओं से घिरे सामाजिक जंतु है।
अब लेख का अंत में बिना किसी तर्क के अपनी अतार्किक बात को सिद्ध करूँगा कि आज़ादी के बाद की दो पीढियां घोर देशद्रोही थी।जी हां ये सत्य है।वो ऐसे कि हम अपने पिछले बीते वर्षों की सरकारों को देशद्रोही कहते हैं पर इनको चुन ने वाली हमारी पिछली पीढियां ही तो थी।पर अगर आप ऐसा नहीं मानते तो उन्हें कम से कम निर्बुद्धि तो कहिये ही।क्योंकि जो हमको जीवन का पाठ पढ़ाते हैं वो खुद अपने शासकों का चयन ठीक से नहीं कर पाए।अब दो में से एक संज्ञा तो आपको उन्हें अपने परम ज्ञान की आधार पर देनी ही होगी।
पर यहाँ पर एक अंतर्विरोध पैदा हो जाता है कि ऐसी पीढ़ियों की उत्पत्ति हम जैसा बुद्धिजीवी वर्ग कैसे हो सकता है?जो की आज़ादी जैसे बड़े क्रांतिकारी बदलाव के बाद फिर से 70 वर्षों के लिए देशद्रोही या निर्बुद्धि बन गयी।परन्तु यहां ये सिद्ध होता है कि प्रकृति के शास्वत नियमों से हम बंधे हुए थे इसलिए हम उन्ही के रूपांतरण का परिणाम हैं।जो की मेरे अनुभव से श्रेष्ठ पीढ़ी हैं।मुझे गर्व हैं कि मैं इस विकसित पीढ़ी का ही भाग हूँ।
इस लेख को लिखने के बाद में स्वयं को बहुत गौरान्वित अनुभव कर रहा हूँ।आशा है,आप भी इस लेख को पढ़ कर स्वयं की महानता को अनुभव कर रहे होंगे।






5 टिप्‍पणियां:

  1. प्रारंभ बहोट अच्छा था । परन्तु अंत आते आते अपने परिचय दे दिया कि यह लेख राजनीति से प्रेरित है और एक दल विशेष के प्रति धुवित है।

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  2. प्रारंभ बहुत अच्छा था । परन्तु अंत आते आते अपने परिचय दे दिया कि यह लेख राजनीति से प्रेरित है और एक दल विशेष के प्रति धुवित है।

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  3. Agar Aapne likha hai to hame garve hai tum bel me kya kar rahe ho?

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  4. अंतिम पैरा मेरे राजनीति ध्रुवीकरण को नहीं,वर्तमान व्यवस्थापकों द्वारा तैयार की गई शून्य राजनीतिक ज्ञान वाली पीढ़ी पर कटाक्ष है।

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  5. अगर मेरे लिखने का हुनर सही में आपको प्रभावित करके मुझ पर शक करने को मजबूर कर दे तो इस से बड़ी तारीफ मेरे लिए नहीं हो सकती।
    धन्यवाद!

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