शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

अपने से लगने लगे हैं। (दिसम्बर,2008)

न जाने क्यों अजीब से ख्याल आने लगे हैं,
दरिया,दरख़्त,नदियां,नज़ारे अपने लगने लगे हैं।
उन्हें देखकर लगा सदी गुजर गई थी अकेले,
न जाने क्यों वो पराये से,पर अपने लगने लगे हैं।

दिल चाहता है,उनके लिए दुनिया से लड़ने को,
न जाने क्यों हमें वो लगते अपने सगे हैं।
छीन लेने को जी चाहता है उन्हें उनसे ही,
वो कुछ पराए से, पर अपने लगने लगे हैं।

बिन बसंत के बाग़ में नई कोंपलें फूटने लगी है,
न जाने क्यों जागती आँखों में सपने पलने लगें हैं।
न चाहते हुए भी आँखें आंखों से मिलने लगी हैं।
न जाने क्यों वो पराये से ,पर अपने लगने लगे हैं।

रोज़ उनसे बात करना नहीं आदत बनाई अपनी,
पर फिर भी दुनिया हमें रोक कर हमसे कहती है!
आप सुधरेंगे नहीं आदत से मजबूर लगने लगे हैं।
न जाने क्यों वो पराये से ,पर अपने लगने लगे हैं।

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