शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

विवाह (2007)

ये जीवन मात्र एक संरचना है,
जो विवेक से जिया तो ठीक।
और विवाह कर लिये तो दुर्घटना है,
विवाह बाद,तो जीवन को खींचना है।

ये यमराज की पाप भोगी पुस्तक की,
सुविस्तृत प्रयोगतात्मक विवेचना है।
सब सोचते,शादी जीवन को सींचना है,
पर ये,अपने हांथों से अपनी गर्दन भींचना है।

जागो पुरुषों,पुरुषार्थ करो,
जीवन में जो करना है करो,
पर भूल कर भी विवाह न करो।
विवाह न करो,विवाह न करो।



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