गुरुवार, 26 सितंबर 2019

मानव एक दुमई

दुमई सुनने में कितना अजीब और गांव देहात का शब्द लगता है।उत्तर भारत के पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा आस पास के लोग इस से वाकिफ होंगे।असल में ये एक सांप की प्रजाति है।जिसके दो मुंह होते हैं,जोकि एक सामाजिक भ्रान्ति मात्र है।असल में,प्राकृतिक रूप से ही इसका पिछला भाग आगे वाले भाग की भांति ही प्रतीत होता है।इसे कुदरत ने इस छद्मावरण का रूपांतरण इसकी सुरक्षा के लिए दिया है।अब दोमुहें सांप का उच्चारण आज रूपांतरित होते-होते "दुमई" हो गया है।अब आप सोच रहे होंगे कि ये लेख आपको किसी जैव वैज्ञानिक खोज की और ले जायेगा पर ऐसा बिल्कुल नहीं हैं।अन्य प्राणियों की क्या चर्चा करना जब मनुष्य ही अपने आप में दुर्लभ प्राणी है।
"मनुष्य एक सामाजिक जंतु है" इसे समझ पाना मेरे लिए कठिन था।परंतु खुद मानव होकर मानवों के साथ रहते रहते मैं भी जंतु बन गया।अब ये बात धीरे धीरे  समझ पा रहा हूँ।पहले मैं मात्र मानव था,अब मैं सामाजिक जंतु हूँ।
मनुष्य एक सामाजिक जंतु तो था ही जिसमें सभी जंतुओं के गुण विद्यमान थे।पर अब दुमई सांप का गुण भी उसने हर लिया है।पर मानव अतिउत्तम किस्म का दुमयी है।हमारे अंदर समय देख कर अपना विचार और तो और स्वभाव बदल देने की कला है।ये बात अगर किसी दुमयी को किसी तरह पता लग गयी तो,अपनी अयोग्यता की ग्लानि से वो आत्महत्या कर लेगा।
जब जागो तभी सवेरा की कहावत पर हम इतने अटल हो गए हैं कि,जैसे ही देश में शासन बदलता है हम सजग हो जाते हैं।सुचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आयी क्रांति के बाद,तो हम देशद्रोहियों का चयन,मूल्यांकन और दंड निर्धारण भी घर बैठे ही कर लेते हैं।ये भी हमारे सुचना प्रौद्योगिकी की क्रांति से पहले और बाद के बदले हुए रूप को प्रदर्शित करता है कि सामाजिक प्राणी ने  दुमई के गुण को भी आत्मसात कर लिया है।यानि कि,हम पहले कुछ और थे आज कुछ और दिखते हैं।डार्विन के विकासवाद के नियम को भी सिद्ध करता है।क्योंकि हमारा मानसिक रूपांतरण हो चूका है।हम निरंतर रूपांतरण की और बढ़ भी रहे हैं।न जाने कब हम क्या बन जाएं।
मानव निरन्तर पहले से अधिक दक्ष होता जा रहा है।पौराणिक काल में मनुष्य वर्षों के तप के बाद इंद्रिय ज्ञान व् अवचेतन मन को समझ पाता था परन्तु आज के दौर में एक रंगीन फोटो पर लिखी दो पंक्तियां हमारी ज्ञानेन्द्रि को जाग्रत कर देती हैं।हम तुरंत अपनी संचार शक्तियों से उन पंक्तियों को संपूर्ण विश्व में पहुंचा देते हैं।अब हम घर बैठे देश विदेशी में हो रही वैश्विक घटनाओं तथा अपने ही देश में चल रहे राजनितिक भूचालों पर अपनी अतार्किक सटीक राय दे देते हैं।हम पहले धर्म की बात न करने वाले को नास्तिक समझते थे।पर अब तो दूसरे धर्म के लोगों से भी अपने धर्म के नारे लगवा कर उनकी हाथों हाथ घर वापसी करवा देते हैं। इसमे कोई समस्या आती है तो उन्हें जीवन मरण के बंधन से ही मुक्त कर देते हैं।पर पहले ऐसा नहीं था,क्योंकि प्रतिदिन शाम को न्यूज चैनल्स पर आने वाले आक्रांताओ का आधारभूत रूपांतरण नहीं हुआ था।ये आक्रांता मुझे अमरत्व प्राप्त बुद्धिजीवियों का अतिविकसित व् अतिशिक्षित महा मानवीय अवतार प्रतीत होते हैं।ये जब जब बोलते हैं,ऐसा प्रतीत होता है कि धरती पर कभी भी ब्रह्मांड के बाहर से हमला हो सकता है।ऐसा इसलिए है क्योंकि ये दूरदर्शी आधुनिक प्रत्यक्षदर्शी हमारे शुभचिंतक हैं।ये हमें आने वाली समस्या से पहले ही अवगत कर देते हैं।संपूर्ण जंतुजाति पृथ्वी के अंत तक इनकी ऋणी रहेगी।
असल में हमारे इस क्रांतिकारी वज्रबुद्धि मानव की आधारशिला रखने का श्रेय तो मुख्य रूप से इन्ही परम प्रजातियों को जाना चाहिए।ये ही हमारे अंदर के कलंदर के जन्मदाता हैं।हमने इनसे खल दल लेकर सामने वाले की छाती पे चढ़ जाने का हुनर सीखा,वो भी तब जब वो हमारी बात मान न रहा हो।हमने जोर जोर से चिल्ला कर,अपनी अतार्किक बात को भी सिद्ध करने की परम विद्या इन्ही लोगों से प्राप्त की।यदि आज इन अनन्य महापुरुषों को परमाकार सर्वज्ञाता की श्रेणी में रखूं तो ये इनके लिए अतिश्योक्ति न होगी।इन्ही लोगों ने हमें हमसे अवगत करवाया।ऐसी परम शक्तियों को हमें एक टांग पर खड़ा होकर फिर धरती पर लेट कर प्रणाम करना चाहिए।
अब हमारे बीच उपस्थित प्रेरणा स्रोतों से फिर से आपको मानवों,माफ़ कीजियेगा जंतुओं की तरफ ले चलता हूँ।इन महापुरुषों पर फिर किसी लेख में चर्चा होगी।इस बात को अन्यथा लेने वाले अन्यथा ही लें क्योंकि मुझ जैसे सामाजिक जंतु से आप और क्या आशा कर सकते हैं।
पर हम आज भी सीधे साधे हैं,जो की हमारे बीते 70 वर्षों के हमारी पिछली पीढ़ियों के देशद्रोह का परिणाम है।अब आप गुस्सा करेंगे कि पिछली दो पीढियां देश द्रोही कैसे?लेख के अंतिम में समझाता हूँ।हम सीधे साधे इसलिए हैं क्योंकि नमक के महंगा होते ही तेल महंगा हो जाता है।जब तक हम नमक का आकलन करते हैं।बात तेल पर पहुँच जाती है।अब तेल की बात शुरू ही की होती है कि ऊपर वाला कहाँ रहेगा इसकी चिंता घर कर लेती है।इस से पता चलता है कि हमारे रूपांतरण के साथ हमारी समस्याएं भी बढ़ी हैं।अब हम समस्याओं से घिरे सामाजिक जंतु है।
अब लेख का अंत में बिना किसी तर्क के अपनी अतार्किक बात को सिद्ध करूँगा कि आज़ादी के बाद की दो पीढियां घोर देशद्रोही थी।जी हां ये सत्य है।वो ऐसे कि हम अपने पिछले बीते वर्षों की सरकारों को देशद्रोही कहते हैं पर इनको चुन ने वाली हमारी पिछली पीढियां ही तो थी।पर अगर आप ऐसा नहीं मानते तो उन्हें कम से कम निर्बुद्धि तो कहिये ही।क्योंकि जो हमको जीवन का पाठ पढ़ाते हैं वो खुद अपने शासकों का चयन ठीक से नहीं कर पाए।अब दो में से एक संज्ञा तो आपको उन्हें अपने परम ज्ञान की आधार पर देनी ही होगी।
पर यहाँ पर एक अंतर्विरोध पैदा हो जाता है कि ऐसी पीढ़ियों की उत्पत्ति हम जैसा बुद्धिजीवी वर्ग कैसे हो सकता है?जो की आज़ादी जैसे बड़े क्रांतिकारी बदलाव के बाद फिर से 70 वर्षों के लिए देशद्रोही या निर्बुद्धि बन गयी।परन्तु यहां ये सिद्ध होता है कि प्रकृति के शास्वत नियमों से हम बंधे हुए थे इसलिए हम उन्ही के रूपांतरण का परिणाम हैं।जो की मेरे अनुभव से श्रेष्ठ पीढ़ी हैं।मुझे गर्व हैं कि मैं इस विकसित पीढ़ी का ही भाग हूँ।
इस लेख को लिखने के बाद में स्वयं को बहुत गौरान्वित अनुभव कर रहा हूँ।आशा है,आप भी इस लेख को पढ़ कर स्वयं की महानता को अनुभव कर रहे होंगे।






शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

#बेटियाँ

ओस की बूंद सी होती है बेटियाँ,
स्पर्श खुरदरा हो,तो रो देती बेटियां।
रौशन करेगा बेटा एक कुल तो,
दो कुलों की लाज होती हैं बेटियाँ।
कोई नहीं होता एक दूसरे से कम,
मोती अगर बेटा, तो हीरा होती बेटियाँ।
काँटों की राह पर खुद चलती रहती,
औरों की राह में फूल बो देती बेटियां।
विधि का विधान है,यही दुनिया की रस्म,
मुठ्ठी में भरे नीर सी होती हैं बेटियां।
संसार ने ये कैसी रीत है बनाई,
अपनी होते भी पराई होती हैं बेटियां।

विजेता

आसमान को छुआ उसने,
धरती का सीना चीरा जिसने,
उठाया पहाड़ों को तोड़ने का बीड़ा है।
उद्गगम का नीर पीया ही उसने।

किंतु,परन्तु,अगर,मगर,
ये सब रास्ते का रोड़ा है।
जिसने नदियों का मुँह मोड़ा है,
उसी ने लक्ष्यों को झकझोरा है।

न रुकने वालों को रोका किसने?
क्योंकि वो रोके कहाँ रुकते है।
इनकी मुट्ठी में है सारा जहाँ,
रास्ते में हर चट्टान को पिसा वहां।

टक्कर झेल उठायी जिसने पीड़ा है,
आसमान की बुलंदियों को छुआ उसने,
जिसने धरती का सीना चीरा है।

अंजान सफर

आखिर हम कहाँ जा रहे हैं?
क्या किसी को खबर है?
या फिर बस चले जा रहे हैं?
सफर भी कितना अजीब है।
गिरहबान तो अपना गन्दा है,
उंगली दूसरों पर उठा रहें है।
हमारी आस्तीन के सांप,
हमारी इंसानियत गटके जा रहे हैं।
हम तो खुद नहीं जानते,
कि हम कहाँ जा रहे हैं?
बस चले जा रहें हैं,
चले जा रहे हैं।
चले जा रहे हैं।

विवाह (2007)

ये जीवन मात्र एक संरचना है,
जो विवेक से जिया तो ठीक।
और विवाह कर लिये तो दुर्घटना है,
विवाह बाद,तो जीवन को खींचना है।

ये यमराज की पाप भोगी पुस्तक की,
सुविस्तृत प्रयोगतात्मक विवेचना है।
सब सोचते,शादी जीवन को सींचना है,
पर ये,अपने हांथों से अपनी गर्दन भींचना है।

जागो पुरुषों,पुरुषार्थ करो,
जीवन में जो करना है करो,
पर भूल कर भी विवाह न करो।
विवाह न करो,विवाह न करो।



अपने से लगने लगे हैं। (दिसम्बर,2008)

न जाने क्यों अजीब से ख्याल आने लगे हैं,
दरिया,दरख़्त,नदियां,नज़ारे अपने लगने लगे हैं।
उन्हें देखकर लगा सदी गुजर गई थी अकेले,
न जाने क्यों वो पराये से,पर अपने लगने लगे हैं।

दिल चाहता है,उनके लिए दुनिया से लड़ने को,
न जाने क्यों हमें वो लगते अपने सगे हैं।
छीन लेने को जी चाहता है उन्हें उनसे ही,
वो कुछ पराए से, पर अपने लगने लगे हैं।

बिन बसंत के बाग़ में नई कोंपलें फूटने लगी है,
न जाने क्यों जागती आँखों में सपने पलने लगें हैं।
न चाहते हुए भी आँखें आंखों से मिलने लगी हैं।
न जाने क्यों वो पराये से ,पर अपने लगने लगे हैं।

रोज़ उनसे बात करना नहीं आदत बनाई अपनी,
पर फिर भी दुनिया हमें रोक कर हमसे कहती है!
आप सुधरेंगे नहीं आदत से मजबूर लगने लगे हैं।
न जाने क्यों वो पराये से ,पर अपने लगने लगे हैं।

याद मुझे आता है!

जुल्फों की घटा,
चेहरे का सवेरा,
याद मुझे आता है,
तेरी बाँहों का बसेरा।

वो पलकों का गिरना,
उठ उठ कर संभलना,
याद मुझे आता है,
कभी मिलना,कभी बिछड़ना।

इठलाना तो कभी सिसकना,
आसुंओ का गालों पे खिसकना,
याद मुझे आ जाता है,
उन्हीं आंसुओं पे फिसलना।

तेरे क़दमों की आहट,
सांसों की गरमाहट,
याद मुझे आता है,बहुत
पहला प्यार,पहली चाहत।

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

लेख- आलोचना का अवलोकन (नवम्बर,2017)

आलोचना का अवलोकन
                               Tj की कलम से

मैं आलोचना की युगों से चली आ रही कला पर देश के युवाओं का ध्यान खींचना चाहता हूँ ,जिसमें आलोचक और आलोचना पाने वाले भी दोनों ही सीमाओं का लांघना पसंद नही करते थे। आलोचना की भाव भंगिमा ही ऐसी होती थी कि आलोचना सुन ने वाला भी भाव विभोर हो जाता था कि उसे सुनने या पढ़ने वालों में उसे न चाहने वाले भी है।
किसी के प्रति आलोचना को व्यक्त करने के लिए माध्यम कम थे,बातें लोगो द्वारा ही पहुँचती थी।किसी तरह कोई छेड़ छाड़ नहीं हुआ करती थी।
बहुत ही शुद्ध भाषा के रूप में आलोचना ,आलोचक से उक्त व्यक्ति तक पहुँच जाती थी ।पर प्राचीन समय में भी कुछ कलाकार थे,जो छिटपुट छेड़ छाड़ कर देते थे,पर कभी  उन्होंने भी सीमाओं को नही लांघा।
अकबर बीरबल की कहानियां हम सभी ने पढ़ी है।
सब जानते हैं की किस तरह बीरबल के बारे में गलत बातें अकबर तक पहुँचती थी।अकबर अपनी प्रखर बुद्धि से कई बातों का मूल्यांकन कर लेता था परंतु शिक्षित न होने कारण बातों में आ ही जाता था तथा विवेकी बीरबल की परीक्षा लेता था।
अब कुछ धार्मिक बौद्धिक महानुभाव ये अंदाज न लगाएं की मैं किसी धर्म विशेष की गुण गान कर रहा हूँ,एक बार दोनों पात्रो के धर्म के बारे में जरूर जान लें।
दोस्तों, बात अब यहाँ ये आती है देश के संविधान के द्वारा तथा हमारे स्वयं के आत्मीय या विवेकी आकलन के आधार पर हमें किस सीमा तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  का उपयोग समाज में हो रहे बदलाव पर सुलोचना या आलोचना देने के लिए करना चाहिए।
ये एक सोचनीय प्रश्न बन चूका है।
आप चाहे किसी भी समुदाय,जातीय वर्ग या विशेष वर्ग से क्यों न हो,चाहे आप कोई भी वादी हो ,किसी अन्य समाज व्यवस्था का समर्थन क्यों न करते हो पर यदि आप एक आलोचना करते है तो प्रथम कर्तव्य है आपका की ये सोच तो लें की आप क्या लिखने जा रहे है।
धरती से जुड़े महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को आशा है सभी ने पढ़ा होगा।
एक बार एक समाचार पत्र में  उनकी कड़ी आलोचना की गयी,उन्होंने संपादक को एक पत्र लिखा और लखनऊ आने का निमंत्रण देते हुए बोले,आईयेगा जरूर आपके लिए चमरौधा(चमड़े का जूता) भीगा के रक्खा है।
आनन् फानन में तिलमिलाए संपादक महोदय लखनऊ आये और दीनबंधु निराला से मिले तो ,हतप्रभ रह गए उनका आदर सत्कार देख कर और उनसे क्षमा मांगी।परन्तु निराला ने उनसे कोई चर्चा ही नही की आलोचना पर।वो भली भांति जानते थे की सभी इस धरती पर उनकी सुलोचना के लिए नहीं आये हैं।
ये तो कुछ बीती घटनाएं थी,अब अवसर आ गया है की कुछ लोगो को चमरौधा भिगाने के लिए विवश कर दूं।
हाल ही में हुई वरिष्ठ पत्रकार ,व्यंग्यकार या आदरणीय दधीचि जी वक्तव्य अनुसार वो जो भी थी,पर उक्त महिला ने कभी सरकार या किसी व्यक्ति विशेष के बारे में इस भाषा का उपयोग नहीं किया।अब मोदी जी से भूल ये हुई वो महान आत्मा के ट्वीटर पर फॉलोवर निकले,अब सारे विशिष्ट लोग उनके पीछे पड़ गए जैसे खुद मोदी जी ने निजी रूप से दधीचि जी से कहा हो की तुम ये करो।
ये तो कुछ ऐसा ही हुआ की मेरे दोस्त ने लड़ाई झगड़ा किया और सर मेरा फोड़ दिया जाये।
मेरे इस वक्तव्य से मुझे अंध राष्ट्रवादी और चमचा या भगवाधारी समझने वाले आगे और पढ़े।
मोदी जी योजनाएं चाहे जो भी रही हो,विशिष्ट योजनाओं की आलोचना या सुलोचना करना लेख का विषय नही है।वो चाहे जिस भी नाम से पुकारे जाये उस से मतलब नहीं ,पर आप के या किसी भी व्यक्ति विशेष के बारे में अभद्र टिप्पणी करने से पहले ये क्यों भूल जाते हैं कि आपकी सीमा कहाँ तक है?
समस्या है तो सिर्फ विवेक का उपयोग न करके आपके विवेक पर प्रयोग किया जा रहा है ये बात आप क्यों नहीं समझते हैं?जो लोग इस तरह से किसी प्रोपगंडा को फैला रहे हैं वो अपने पीछे बैठे किसी भी सपोर्ट से ज्यादा जिम्मेदार है,इस व्याप्त अव्यवस्था के लिए।
लोग इस तरह से अंधे हो गए हैं कि वो किसी को नहीं  छोड़ रहे हैं।
जब हम किसी जानकारी को सुनते है तो हम पर आधा प्रभाव डालती है, पर जब हम उसे देखते और सुनते हैं तो अधिक प्रभाव डालती है, पर जब उस जानकारी से कोई चर्चित मुखोटा लग जाता है तो उसे ही हम सच जान लेते है।
यही सत्य है, आज की आलोचना का।
 सभी सामाजिक वेबसाइट पर यही आलोचना का नग्न खेल खेला जा रहा है।अगर किसी ने कीचड़ फेंका है तो अपना मुंह साफ़ करने पहले उस पर कीचड़ फेंकना अनिवार्य हो गया है।
और यह काम वही करते है जो आपको या खुद को या आलोचना करने वाले को तर्कों द्वारा समझा नहीं सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर देश की राजधानी में बुद्धिजीवियों की उदयभूमि रहे जे ऐन यु में नकली समझवादी (नकली क्यों आगे है भड़के न)का एक धड़ा देवी देवताओं को गलत बोलता है या उनके बारे में अश्लील बातें बोलता है,आखिर इस से क्या निष्कर्ष निकलता है कि आप स्वयं तो ईश्वर में आस्था नहीं रखते पर जो रखता है उसे आप अनीश्वरवाद के बारे में समझा तो नहीं पाये तो झुंझलाहट को दूर करने के लिए लगे गरियाने।
अब सुनिये नकली क्यों कहे गए मेरे अनुसार दो ही समाजवादी लोगो ने जन्म लिया है भारत की धरती पर पहले शहीद भगत सिंह और दूसरे त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ।इन दोनों में भी जमीन आसमान का फर्क है एक ने उन विचारो के लिए मृत्यु को गले लगा लिया और दूसरे ने जीवन ही समर्पित कर दिया।कुर्ता के नीचे जीन्स और काँधे पर अंगोछा डाल लेने से उसके बाद एक साइड बस्ता टांग कर बिना बात के अपने विचारों को थोपने से कोई समाजवादी नहीं बन जाता है।
अब बात आती है पूजनीय अंध राष्ट्रवादियों की,आप लोगों ने सही में यह तय कर दिया की कोई मुर्ख नहीं पैदा होता ,या तो वो खुद मुर्ख बन जाता है या मुर्ख बन ने के बाद उससे मजा आने लगता है।

सभी समुदायों को डर की कोई दूसरा समुदाय उन्हें खा जायेगा।
थोड़ा सा घर के बाहर झाँक के देखा जाये तो समझ आएगा।अमरिका में मीडिया और सरकार सदा एक डर व्याप्त रखती आयी है अपनी जनता के बीच,कि मध्य पूर्व के देश कट्टर है और वो एक दिन तुम्हे खा जायेंगे।इसके पीछे कारण है दुनिया में हर तरह असंतुलन को बनाये रखना। चाहे वो आर्थिक हो राजनैतिक हो या शक्ति हो ,क्योंकि तभी उसका डंका बजट रहे।पर इस सब के लिए चाहिए मुद्रा वो कहाँ से आये उसके लिए चाहिए करदाताओं का पैसा ।
अब उनसे ऐंठा कैसे जाये तो ऐसा प्रोपगंडा रचो की तुम कुछ भी करो वो कुछ न बोले।
समय समय पर इसका हर्जाना भी उनकी भोली जनता  ने भरा है।
यहाँ कहानी ही उलट है ,देश का सबसे खोखला खंभा ही देश को खा रहा है अगर एक बार ये सुधर गया तो खुद तो खरोच खायेगा पर बहुत को ठिकाने लगा देगा।
अब बात रही इन सब के बीच हम कहाँ आते हैं उससे पहले कुछ और स्पष्ट प्रश्न है।
१)हम इस 21वीं शताब्दी के होकर भी क्यों अपने बीते हुए कल से भी पीछे जा रहे हैं ?हम आखिर खुद को सही रखने पचड़े में पड़ कर किसी को गलत साबित करने की सीमा को क्यों पार कर जा रहे हैं?

२)हमें क्यों नही समझ आता की देश में जब भी कोई अप्रत्याशित घटना होती है तो उसे दबाने के लिए दूसरी अप्रत्याशित घटना की और हमारा ध्यान खींचा जाता है?
सम्बन्धित घटनाये को देखे जरा:

१) नोटबंदी
किसे क्या मिला पता नहीं सब आपस में झगड़ रहें हैं बस।
बाकि पूर्व दो गवर्नर ,एक अर्थशास्त्री सब गलत है ।अर्थशास्र अब आपके घर की खेती हो गयी है।

२) कोलगेट,कामनवेल्थ,2G, DGCA,अगुस्ता वेस्टलैंड और गिनती बहुत है, सब भूल गए गोमाता के लिए।
मानता हूं वो जीव हत्या किसी भी रूप में गलत है,पर ये क्यों भुला दिया? ये सब क्यों नहीं पूछते जांच कहाँ तक पहुचीं?

३)बस पुरे शरीर पर बालों वाले को सजा क्या हुई लग गए उसके कार्टून और चुटकुले बना ने में।इस बीच बहुत सी चीखें दब गयी जिन्हें आपका साथ चाहिए था।(बापू कांड)

आपको पता है आप घिर गए है?सोचिये कैसे?

आप फँस गए हैं अपनी कही बातों के बीच ,अपने ही किये कामों के बीच।आप नहीं सुन ना चाहते की आप क्यों गलत हैं?
ये अभद्र वक्तव्य ,झुंझलाहट है आपकी।
बिना सोचे समझे किसी और के हांथो से निकले कचरे को लगे पड़े हैं आगे वाले को भेजने में लो मैं सूंघ लिया तुम भी सूँघो और आगे भेज दो।(व्हाट्स एप्प पर फॉरवार्डिंग)
अगर किसी ने कुछ बोला उड़ेल दो सारा कचरा उस पर।
आप ये क्यों नहीं देख तहे यहां मुद्दों को सुंघनी की डिबिया में संजोया जा रहा है जब भी कुछ गलत हो निकालो एक चुटकी भर और सूँघो फिर छिंको इतनी तेज की पुरे देह में खलबली मच जाये।
अगर आपसे पूंछा भी जाये की आपने ऐसा क्यों बोला तो उत्तर आता है ,उसने भी तो बोला था ,इसलिये मैंने बोला। इस सन्दर्भ में दो ही अर्थ निकलते है या तो आपको बोलना ही नहीं आता है,जिस कारण आप सामने वाले के निम्न स्तर के वक्तव्य को तटस्थ नहीं कर पाएं या तो आप उस से भी नीच भाषा का उपयोग करके सभी को दिखाना चाहते है कि मैं डरा नहीं ,और इस कला में ये अकेला पारंगत नहीं है।मैं भी बहुत बड़ा कलाकार हूँ।कीचड़ का जवाब कीचड़ से।

हम विश्व के सबसे युवा देश हैं।
इस शताब्दी के अंत तक अधिकतर देशों में युवाओं की संख्या  बुजुर्गो की संख्या से काफी कम हो जायेगी,पर भारत देश में इसके विपरीत युगान्तकारी स्तिथि होगी।
आप सभी से प्रार्थना है कि आलोचना का स्तर को गिरने न दें,करें खूब जी भर के करें,पर उससे स्वीकारें भी।

मुझे डर है कहीं हम और आप आमने सामने न आ जाये।देश आज़ादी के बाद ,धरती को
अपने ही लोगो के खून से,लोगो के द्वारा ही रंगता देख चुका है।एक विभाजन देख चुका है।मुझे नहीं लगता दूसरा विभाजन श्रेयस्कर होगा।

अगर कही पक्ष है ,तो विपक्ष का होना अति आवश्यक है।
परन्तु विडम्बना देखिये,पक्ष और विपक्ष का काम भी जनता ही कर दे रही है।सामाजिक मंच वैचारिक खून खराबे का मंच बन चुके हैं।उन्नत प्रौद्योगिकी द्वारा रचित संचार क्रांति के विश्व पटल का उपयोग सफल,सुपाच्य,स्वस्थ विचार विमर्श  के लिए करें।आपका एक वक्तव्य जिसे पूरा विश्व पढ़ सकता है तो इससे सामाजिक मंचो या वेबसाइट पर डालने के बाद इसका मूल्य और भी अधिक बढ़ जाता है।ये किसी को भी भड़का सकता है ,कृपया ऐसा न करें।
आप पक्ष में है चाहे विपक्ष ऐसा लिखे या बोले की सामने वाले को विवश कर दें,अपने ही अनुरूप स्वछता से बोलने ले लिए।सामने वाला तनिक भी चेष्टा न करे अपशब्द बोलने की।आप का अच्छी भाषा में किया गया कटाक्ष आपके अभद्रता से किये कटाक्ष से कही ज्यादा घातक होगा।
पक्ष तथा विपक्ष की भूमिका को समझें।
पक्ष और विपक्ष दोनों ही मजबूत हो तो लोकतान्त्रिक शक्ति का अति उत्तम संतुलन बना रहता है तथा राष्ट्र प्रगति पथ पर अग्रसर रहता है।

धरती की पुकार

अब उठो वसुधा के रक्षक,
अकृन्दन व् चीत्कार सुनो,
मत बनो वसुधा के भक्षक,
धरती माँ की भी पुकार सुनो।
कर लिया हमने बहुत अपना,
अब धरती माँ का भी उद्धार करो।

बिलखती नदियां कह रही,
अब तो कुछ उपकार करो।
कहाँ कहाँ से रोकोगे मुझको,
केदारनाथ,चेन्नई,केरल पर विचार करो।

त्रासदियों को गीदड़ भभकी समझने वालों,
कंक्रीट के जंगल का बंद ये निर्माण करो।
बंद करो विनाशलीला रूपी विकासलीला,
हरे आभूषण अलंकृत धरा का निर्माण करो।

हे प्रदूषकों,इस विदूषक पर भी ध्यान धरो,
धरती की करुण वंदन पुकार सुनो।

अफ़सोस

दुनिया बहुत बुरी है,
मैं कुछ कर नहीं सकता।

खफा तुझसे नहीं ऐ दुनिया,
खफा खुद से हूँ कि तुझे बदल नहीं सकता।

जिंदगी बिता दी इतनी यूँ ही मैंने,
सब पा कर भी,गवां कर बैठा हूँ,

न जाने क्या खोजने निकला था,
आज खुद को ही भुला कर बैठा हूँ।

अब और क्या कहूँ खुद के बारे में,
न गिला किसी से,न शिकवा किसी से,

न मोहब्बत किसी से,न वफ़ा किसी से।
जो होना होगा,वो देखा जायेगा,

मुख़्तार बनने का सिला देती है ये दुनिया,
मैं अपना मुकद्दर ही भुला कर बैठा हूँ।

ठाठ

जो लोग सोचते ही रह गए,
वो इरादे पुरे कर के आया हूँ,
लोग ने सिर्फ ख्वाब बुनते रह गए,
मैं तो आसमां से ख्वाब ही तोड़ लाया हूँ।

कि किसी ने ऊंचाइयां छू के जिया,
किसी ने गहराइयां छू के जिया,
हम तो वो बाज़ हैं दोस्तों,
जिसने बड़ी गहराई से ऊंचाई को छुआ।

जीते होंगे लोग जिंदगी 8 से दस अपनी,
मैंने जिंदगी को आठ से आठ ही जिया,
हैरान,हताश,परेशां न हो,मेरे रहते,
मैंने जिंदगी को बड़े ठाठ से है जिया।

मेरी जवानी

मेरी जवानी

 मैं बेख़ौफ़ उड़ा करता था,मौजों के ऊपर
जब अंदर का नौजवाँ उमड़ता था।
जंग मैंने जीती थी कई,
मेरा कारवाँ जहाँ से भी गुजरता था।

पग पग चलते पहर का पता न चलता था,
वक़्त मेरे और मैं वक़्त के साथ चलता था।
आंधियो से बनती नही थी मेरी,
तेज हवाओं से मैं लड़ता था।

पर मेरी बेपरवाही ने शहादत दे दी नौजवानी को,
जब वक़्त साथ न देता तो मैं वक़्त से अकड़ता था।
जवानी के जोश का सिरमौर न था मेरा,
बड़ी मर्दानगी से वक़्त से झगड़ता था।

अब वो हवाएं उडती नही,आंधिया संद है
शोर तो बहुत है,बस मेरी ही आवाज़ मंद है।
अटखेलियां,शैतानियां,मेरी हाज़िरजवाबी,
उमर्दराजी की बैरकों घुट चुकी है मेरी जवानी। 

उठो पार्थ


करो स्मरण माँ कुंती के वनवास को
करो स्मरण द्रौपदी की चीत्कार को,
कुरु वंश का रणभूमि में न उपहास हो,
कि भावी पीढ़ी को तुम पर धित्कार हो।

तोड़ डालो,दुर्योंधन के अहंकार को,
निष्फल कर दो,दुष्टों के हर प्रहार को,
समाप्त करो,बढ़ते दुष्टों के भार को,
सुनो तुम माँ वसुधा की पुकार को।

मंद पड़ जायें,पोडरिक,हिरण्यगर्भ और विदारक,
कुछ ऐसी देवदत की आज ललकार हो,
कर दो शत्रु के रक्त से कुरुक्षेत्र को रक्तरंजित,
आज उद्धार करने वाली धरती का भी उद्धार हो।

पार्थ,संघार करो तुम शत्रु का,
चढ़ाओ प्रत्यंचा अपने गांडीव पर,
हृदय दहल जाये शत्रु का,
मात्र प्रत्यंचा की हर टंकार पर।

विषय विकार से ऊपर उठ जाओ,
कर्तव्य परायणता का व्यवहार करो।
भावी पीढ़ी का आदर्श बन जाओ,
धर्मयुद्ध की विजय पताका फहराओ।

(पौराणिक काल में,सभी योद्धाओं के युद्ध उद्घोषणा के लिए शंख होते थे।पौडरिक पितामह भीष्म का,हिरण्यगर्भ कर्ण का और विदारक दुर्योधन का शंख था।)


नितेश तिवारी 'गौमेध'
दूरभाष-9999329945





































युवा भारत

ज्ञान,विज्ञान,वाणिज्य,कला
खेल-कूद या हो कुछ और,
विश्व धरातल पर चर्चित हूँ मैं।
देखो मुझे,युवा भारत हूँ मैं।

विकास,संस्कृति और परंपरा,
लिए हाथो में लक्ष्य,मैं चल पड़ा।
विश्व ह्रदय विजयी हूँ मैं।
ध्यान दो,युवा भारत हूँ मैं।

धर्म,जाति, वर्ग,विषय,
इन सब से ऊपर उठ चुका।
विश्व प्रगति ले,आगे बड्ड चला।
विश्व विकास का वर्चस्व हूँ मैं।
उपेक्षित नहीं,युवा भारत हूँ मैं।

सत्य भी हूँ मैं।
शिव है मुझमें,
सूंदर भी हूँ मैं।
सत्यम शिवम सुंदरम शास्वत हूँ मैं।
विशालकाय हूँ,ये आडम्बर नहीं,
हे विश्व देखो मुझे युवा भारत हूँ मैं।।

मोमबत्ती गैंग

तुम शांत रहो,मोमबत्तियों वालो,
जलाओ सिर्फ मोमबत्तियां चौराहों पर,
और करने दो,उनको उनके काम,
बैठाना है बच्चों को ऊँचे पदों पर,
बस्ता टांगों,लंच उठाओ,चलो अपने काम पर।

सुरमयीं आखियां लेके,दो दिन को जागने वालों,
अरे! भेजो अपनी औलाद को फ़ौज में,
मट्टी के शेर की तरह भोंकने वालों,
घर बैठे सर्जिकल स्ट्राइक मांगने वालों।

टी आर पी की दुकानों से वीरता साहस पाने वालों,
हो चुके तुम खोखले,सुकून की ज़िंदगी बिताने वालों,
40 लाल तो खो दिए,हज़ारों की आहुति मांगने वालों,
भेजो जिगर के टुकड़े को युद्ध क्षेत्र में,
घर में सोफे पर बैठ कर युद्ध लड़ने वालों।

मोमबत्ती जलाकर,अलख जलाने का नाटक बंद करो।
और है इतना ही दुःख उन चालीस योद्धाओं का,
नहीं कुछ कर सकते तो,इनके परिवारों की मदद करो,
और करना है कुछ तो,टीआरपी की दुकानें बंद करने की मांग करो।

तुम्हारा मेरा साथ

कभी कभी गुस्सा बहुत करती हो,
पर जब तुम,मेरे कांधे पर सर
रख कर अपनी बाहें मेरी बाहों में डाल कर
साथ बैठती हो,
तो ऐसा लगता है,जैसे शादी को एक हफ्ता बाकी है।
और तुम मुझसे मिलने आयी हो।
और हम दोंनो कहीं बैठ कर सपनें बून रहें हैं।

जब कभी रात को हमारी अनबन हो जाती है,
तो मैं सोचता हूँ,कि तन्हा ही अच्छा था,
पर सुबह जब कभी,मैं कहीं अकेला बैठा होता हूँ,
तो ये सोचने से भी घबरा उठता हूँ कि,
कहीं तन्हा हो न जाऊं।


जब जब मुझे लगता है,
पुरे घर को सँभालने के चक्कर में,
तुम्हे पास से देखे काफी दिन हो गये हैं,
मजबूरन,सुबह ऑफिस जाते हुए ,
बुशर्ट के एक बटन को आहुति देनी पड़ती है,
तुम्हे मेरे पास लाने के लिए।
मैं बड़ी बेसब्री से इन्तजार करता हूँ,
उस आखरी टाँके का,
जिसके बाद तुम्हे अपने होंठो से
धागे को काटने के लिए
मेरे पास आना ही पड़ता है।

तुम जब जब मेरी आदतों पर
मुझे गुस्से से डांटती हो न,
और मैं हल्की सी हंसी लिए तुम्हारी,
आँखों में देखने लगता हूं।
तो तुम जान बूझ कर मेरी,
आँखों में देखती ही नहीं,
वो क्यों हम दोनो जानते हैं।
लिखना जरुरी नहीं समझता।


सुबह मैं लेट हो रहा होता हूँ,
लेट मैं होता हूँ,नाश्ता तुम्हारा टाइम पर
बन गया होता है,
मैं और जल्दबाज़ी करता हूँ,
नाश्ता छोड़ने की जिद्द करता हूँ,
तुम जब अपने हांथो से खिलाने के लिए पीछे
दौड़ती हो न,
ऐसा लगता है कि रोज लेट हो जाने
का मजा ही कुछ और है।


जब जब बेटी को तुम मेरे पास,
छोड़ कर काम मैं लग जाती हो,
और उसकी शैतानियां मुझे उस पर
गुस्सा होने को मजबूर कर देती है।
तब मुझे याद आता है वो दिन,
जब मैंने पहली बार उसे गोद में लिया था,
और वो एक टक मेरी और देख रही थी।
और मैं कब सब कुछ भूल जाता हूँ,
पता ही नहीं लगता है।

जब मैं शाम को तुमसे मिलता हूँ,
तो दिन भर की जुदाई के बाद वो,
मिलने का एहसास ही,
मुझमे ज़िन्दगी को जीने जोश पैदा,
कर देता है।
और मेरी थकान को ऊर्जा में बदल देता है।

बस ऐसा ही तुम्हारा और मेरा साथ,

जहाज़ी

मेरी रगों में तैरना,
और नसीब में बहना,
लिखा है,
लहरों से ऊँचा जज़्बा है मेरा,
मेहनत की दवात से,
नसीब मैंने अपना लिखा है।
हूँ बहुत बड़ा जहाजी मैं,
कूंच करता हूँ जहां,
साहिल को मेरा जहाज,
मंजिल को मेरा मस्तूल दिखता है।

नितेश तिवारी