गुरुवार, 19 सितंबर 2019

लेख- आलोचना का अवलोकन (नवम्बर,2017)

आलोचना का अवलोकन
                               Tj की कलम से

मैं आलोचना की युगों से चली आ रही कला पर देश के युवाओं का ध्यान खींचना चाहता हूँ ,जिसमें आलोचक और आलोचना पाने वाले भी दोनों ही सीमाओं का लांघना पसंद नही करते थे। आलोचना की भाव भंगिमा ही ऐसी होती थी कि आलोचना सुन ने वाला भी भाव विभोर हो जाता था कि उसे सुनने या पढ़ने वालों में उसे न चाहने वाले भी है।
किसी के प्रति आलोचना को व्यक्त करने के लिए माध्यम कम थे,बातें लोगो द्वारा ही पहुँचती थी।किसी तरह कोई छेड़ छाड़ नहीं हुआ करती थी।
बहुत ही शुद्ध भाषा के रूप में आलोचना ,आलोचक से उक्त व्यक्ति तक पहुँच जाती थी ।पर प्राचीन समय में भी कुछ कलाकार थे,जो छिटपुट छेड़ छाड़ कर देते थे,पर कभी  उन्होंने भी सीमाओं को नही लांघा।
अकबर बीरबल की कहानियां हम सभी ने पढ़ी है।
सब जानते हैं की किस तरह बीरबल के बारे में गलत बातें अकबर तक पहुँचती थी।अकबर अपनी प्रखर बुद्धि से कई बातों का मूल्यांकन कर लेता था परंतु शिक्षित न होने कारण बातों में आ ही जाता था तथा विवेकी बीरबल की परीक्षा लेता था।
अब कुछ धार्मिक बौद्धिक महानुभाव ये अंदाज न लगाएं की मैं किसी धर्म विशेष की गुण गान कर रहा हूँ,एक बार दोनों पात्रो के धर्म के बारे में जरूर जान लें।
दोस्तों, बात अब यहाँ ये आती है देश के संविधान के द्वारा तथा हमारे स्वयं के आत्मीय या विवेकी आकलन के आधार पर हमें किस सीमा तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  का उपयोग समाज में हो रहे बदलाव पर सुलोचना या आलोचना देने के लिए करना चाहिए।
ये एक सोचनीय प्रश्न बन चूका है।
आप चाहे किसी भी समुदाय,जातीय वर्ग या विशेष वर्ग से क्यों न हो,चाहे आप कोई भी वादी हो ,किसी अन्य समाज व्यवस्था का समर्थन क्यों न करते हो पर यदि आप एक आलोचना करते है तो प्रथम कर्तव्य है आपका की ये सोच तो लें की आप क्या लिखने जा रहे है।
धरती से जुड़े महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को आशा है सभी ने पढ़ा होगा।
एक बार एक समाचार पत्र में  उनकी कड़ी आलोचना की गयी,उन्होंने संपादक को एक पत्र लिखा और लखनऊ आने का निमंत्रण देते हुए बोले,आईयेगा जरूर आपके लिए चमरौधा(चमड़े का जूता) भीगा के रक्खा है।
आनन् फानन में तिलमिलाए संपादक महोदय लखनऊ आये और दीनबंधु निराला से मिले तो ,हतप्रभ रह गए उनका आदर सत्कार देख कर और उनसे क्षमा मांगी।परन्तु निराला ने उनसे कोई चर्चा ही नही की आलोचना पर।वो भली भांति जानते थे की सभी इस धरती पर उनकी सुलोचना के लिए नहीं आये हैं।
ये तो कुछ बीती घटनाएं थी,अब अवसर आ गया है की कुछ लोगो को चमरौधा भिगाने के लिए विवश कर दूं।
हाल ही में हुई वरिष्ठ पत्रकार ,व्यंग्यकार या आदरणीय दधीचि जी वक्तव्य अनुसार वो जो भी थी,पर उक्त महिला ने कभी सरकार या किसी व्यक्ति विशेष के बारे में इस भाषा का उपयोग नहीं किया।अब मोदी जी से भूल ये हुई वो महान आत्मा के ट्वीटर पर फॉलोवर निकले,अब सारे विशिष्ट लोग उनके पीछे पड़ गए जैसे खुद मोदी जी ने निजी रूप से दधीचि जी से कहा हो की तुम ये करो।
ये तो कुछ ऐसा ही हुआ की मेरे दोस्त ने लड़ाई झगड़ा किया और सर मेरा फोड़ दिया जाये।
मेरे इस वक्तव्य से मुझे अंध राष्ट्रवादी और चमचा या भगवाधारी समझने वाले आगे और पढ़े।
मोदी जी योजनाएं चाहे जो भी रही हो,विशिष्ट योजनाओं की आलोचना या सुलोचना करना लेख का विषय नही है।वो चाहे जिस भी नाम से पुकारे जाये उस से मतलब नहीं ,पर आप के या किसी भी व्यक्ति विशेष के बारे में अभद्र टिप्पणी करने से पहले ये क्यों भूल जाते हैं कि आपकी सीमा कहाँ तक है?
समस्या है तो सिर्फ विवेक का उपयोग न करके आपके विवेक पर प्रयोग किया जा रहा है ये बात आप क्यों नहीं समझते हैं?जो लोग इस तरह से किसी प्रोपगंडा को फैला रहे हैं वो अपने पीछे बैठे किसी भी सपोर्ट से ज्यादा जिम्मेदार है,इस व्याप्त अव्यवस्था के लिए।
लोग इस तरह से अंधे हो गए हैं कि वो किसी को नहीं  छोड़ रहे हैं।
जब हम किसी जानकारी को सुनते है तो हम पर आधा प्रभाव डालती है, पर जब हम उसे देखते और सुनते हैं तो अधिक प्रभाव डालती है, पर जब उस जानकारी से कोई चर्चित मुखोटा लग जाता है तो उसे ही हम सच जान लेते है।
यही सत्य है, आज की आलोचना का।
 सभी सामाजिक वेबसाइट पर यही आलोचना का नग्न खेल खेला जा रहा है।अगर किसी ने कीचड़ फेंका है तो अपना मुंह साफ़ करने पहले उस पर कीचड़ फेंकना अनिवार्य हो गया है।
और यह काम वही करते है जो आपको या खुद को या आलोचना करने वाले को तर्कों द्वारा समझा नहीं सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर देश की राजधानी में बुद्धिजीवियों की उदयभूमि रहे जे ऐन यु में नकली समझवादी (नकली क्यों आगे है भड़के न)का एक धड़ा देवी देवताओं को गलत बोलता है या उनके बारे में अश्लील बातें बोलता है,आखिर इस से क्या निष्कर्ष निकलता है कि आप स्वयं तो ईश्वर में आस्था नहीं रखते पर जो रखता है उसे आप अनीश्वरवाद के बारे में समझा तो नहीं पाये तो झुंझलाहट को दूर करने के लिए लगे गरियाने।
अब सुनिये नकली क्यों कहे गए मेरे अनुसार दो ही समाजवादी लोगो ने जन्म लिया है भारत की धरती पर पहले शहीद भगत सिंह और दूसरे त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ।इन दोनों में भी जमीन आसमान का फर्क है एक ने उन विचारो के लिए मृत्यु को गले लगा लिया और दूसरे ने जीवन ही समर्पित कर दिया।कुर्ता के नीचे जीन्स और काँधे पर अंगोछा डाल लेने से उसके बाद एक साइड बस्ता टांग कर बिना बात के अपने विचारों को थोपने से कोई समाजवादी नहीं बन जाता है।
अब बात आती है पूजनीय अंध राष्ट्रवादियों की,आप लोगों ने सही में यह तय कर दिया की कोई मुर्ख नहीं पैदा होता ,या तो वो खुद मुर्ख बन जाता है या मुर्ख बन ने के बाद उससे मजा आने लगता है।

सभी समुदायों को डर की कोई दूसरा समुदाय उन्हें खा जायेगा।
थोड़ा सा घर के बाहर झाँक के देखा जाये तो समझ आएगा।अमरिका में मीडिया और सरकार सदा एक डर व्याप्त रखती आयी है अपनी जनता के बीच,कि मध्य पूर्व के देश कट्टर है और वो एक दिन तुम्हे खा जायेंगे।इसके पीछे कारण है दुनिया में हर तरह असंतुलन को बनाये रखना। चाहे वो आर्थिक हो राजनैतिक हो या शक्ति हो ,क्योंकि तभी उसका डंका बजट रहे।पर इस सब के लिए चाहिए मुद्रा वो कहाँ से आये उसके लिए चाहिए करदाताओं का पैसा ।
अब उनसे ऐंठा कैसे जाये तो ऐसा प्रोपगंडा रचो की तुम कुछ भी करो वो कुछ न बोले।
समय समय पर इसका हर्जाना भी उनकी भोली जनता  ने भरा है।
यहाँ कहानी ही उलट है ,देश का सबसे खोखला खंभा ही देश को खा रहा है अगर एक बार ये सुधर गया तो खुद तो खरोच खायेगा पर बहुत को ठिकाने लगा देगा।
अब बात रही इन सब के बीच हम कहाँ आते हैं उससे पहले कुछ और स्पष्ट प्रश्न है।
१)हम इस 21वीं शताब्दी के होकर भी क्यों अपने बीते हुए कल से भी पीछे जा रहे हैं ?हम आखिर खुद को सही रखने पचड़े में पड़ कर किसी को गलत साबित करने की सीमा को क्यों पार कर जा रहे हैं?

२)हमें क्यों नही समझ आता की देश में जब भी कोई अप्रत्याशित घटना होती है तो उसे दबाने के लिए दूसरी अप्रत्याशित घटना की और हमारा ध्यान खींचा जाता है?
सम्बन्धित घटनाये को देखे जरा:

१) नोटबंदी
किसे क्या मिला पता नहीं सब आपस में झगड़ रहें हैं बस।
बाकि पूर्व दो गवर्नर ,एक अर्थशास्त्री सब गलत है ।अर्थशास्र अब आपके घर की खेती हो गयी है।

२) कोलगेट,कामनवेल्थ,2G, DGCA,अगुस्ता वेस्टलैंड और गिनती बहुत है, सब भूल गए गोमाता के लिए।
मानता हूं वो जीव हत्या किसी भी रूप में गलत है,पर ये क्यों भुला दिया? ये सब क्यों नहीं पूछते जांच कहाँ तक पहुचीं?

३)बस पुरे शरीर पर बालों वाले को सजा क्या हुई लग गए उसके कार्टून और चुटकुले बना ने में।इस बीच बहुत सी चीखें दब गयी जिन्हें आपका साथ चाहिए था।(बापू कांड)

आपको पता है आप घिर गए है?सोचिये कैसे?

आप फँस गए हैं अपनी कही बातों के बीच ,अपने ही किये कामों के बीच।आप नहीं सुन ना चाहते की आप क्यों गलत हैं?
ये अभद्र वक्तव्य ,झुंझलाहट है आपकी।
बिना सोचे समझे किसी और के हांथो से निकले कचरे को लगे पड़े हैं आगे वाले को भेजने में लो मैं सूंघ लिया तुम भी सूँघो और आगे भेज दो।(व्हाट्स एप्प पर फॉरवार्डिंग)
अगर किसी ने कुछ बोला उड़ेल दो सारा कचरा उस पर।
आप ये क्यों नहीं देख तहे यहां मुद्दों को सुंघनी की डिबिया में संजोया जा रहा है जब भी कुछ गलत हो निकालो एक चुटकी भर और सूँघो फिर छिंको इतनी तेज की पुरे देह में खलबली मच जाये।
अगर आपसे पूंछा भी जाये की आपने ऐसा क्यों बोला तो उत्तर आता है ,उसने भी तो बोला था ,इसलिये मैंने बोला। इस सन्दर्भ में दो ही अर्थ निकलते है या तो आपको बोलना ही नहीं आता है,जिस कारण आप सामने वाले के निम्न स्तर के वक्तव्य को तटस्थ नहीं कर पाएं या तो आप उस से भी नीच भाषा का उपयोग करके सभी को दिखाना चाहते है कि मैं डरा नहीं ,और इस कला में ये अकेला पारंगत नहीं है।मैं भी बहुत बड़ा कलाकार हूँ।कीचड़ का जवाब कीचड़ से।

हम विश्व के सबसे युवा देश हैं।
इस शताब्दी के अंत तक अधिकतर देशों में युवाओं की संख्या  बुजुर्गो की संख्या से काफी कम हो जायेगी,पर भारत देश में इसके विपरीत युगान्तकारी स्तिथि होगी।
आप सभी से प्रार्थना है कि आलोचना का स्तर को गिरने न दें,करें खूब जी भर के करें,पर उससे स्वीकारें भी।

मुझे डर है कहीं हम और आप आमने सामने न आ जाये।देश आज़ादी के बाद ,धरती को
अपने ही लोगो के खून से,लोगो के द्वारा ही रंगता देख चुका है।एक विभाजन देख चुका है।मुझे नहीं लगता दूसरा विभाजन श्रेयस्कर होगा।

अगर कही पक्ष है ,तो विपक्ष का होना अति आवश्यक है।
परन्तु विडम्बना देखिये,पक्ष और विपक्ष का काम भी जनता ही कर दे रही है।सामाजिक मंच वैचारिक खून खराबे का मंच बन चुके हैं।उन्नत प्रौद्योगिकी द्वारा रचित संचार क्रांति के विश्व पटल का उपयोग सफल,सुपाच्य,स्वस्थ विचार विमर्श  के लिए करें।आपका एक वक्तव्य जिसे पूरा विश्व पढ़ सकता है तो इससे सामाजिक मंचो या वेबसाइट पर डालने के बाद इसका मूल्य और भी अधिक बढ़ जाता है।ये किसी को भी भड़का सकता है ,कृपया ऐसा न करें।
आप पक्ष में है चाहे विपक्ष ऐसा लिखे या बोले की सामने वाले को विवश कर दें,अपने ही अनुरूप स्वछता से बोलने ले लिए।सामने वाला तनिक भी चेष्टा न करे अपशब्द बोलने की।आप का अच्छी भाषा में किया गया कटाक्ष आपके अभद्रता से किये कटाक्ष से कही ज्यादा घातक होगा।
पक्ष तथा विपक्ष की भूमिका को समझें।
पक्ष और विपक्ष दोनों ही मजबूत हो तो लोकतान्त्रिक शक्ति का अति उत्तम संतुलन बना रहता है तथा राष्ट्र प्रगति पथ पर अग्रसर रहता है।

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