गुरुवार, 19 सितंबर 2019

अफ़सोस

दुनिया बहुत बुरी है,
मैं कुछ कर नहीं सकता।

खफा तुझसे नहीं ऐ दुनिया,
खफा खुद से हूँ कि तुझे बदल नहीं सकता।

जिंदगी बिता दी इतनी यूँ ही मैंने,
सब पा कर भी,गवां कर बैठा हूँ,

न जाने क्या खोजने निकला था,
आज खुद को ही भुला कर बैठा हूँ।

अब और क्या कहूँ खुद के बारे में,
न गिला किसी से,न शिकवा किसी से,

न मोहब्बत किसी से,न वफ़ा किसी से।
जो होना होगा,वो देखा जायेगा,

मुख़्तार बनने का सिला देती है ये दुनिया,
मैं अपना मुकद्दर ही भुला कर बैठा हूँ।

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