कभी कभी गुस्सा बहुत करती हो,
पर जब तुम,मेरे कांधे पर सर
रख कर अपनी बाहें मेरी बाहों में डाल कर
साथ बैठती हो,
तो ऐसा लगता है,जैसे शादी को एक हफ्ता बाकी है।
और तुम मुझसे मिलने आयी हो।
और हम दोंनो कहीं बैठ कर सपनें बून रहें हैं।
जब कभी रात को हमारी अनबन हो जाती है,
तो मैं सोचता हूँ,कि तन्हा ही अच्छा था,
पर सुबह जब कभी,मैं कहीं अकेला बैठा होता हूँ,
तो ये सोचने से भी घबरा उठता हूँ कि,
कहीं तन्हा हो न जाऊं।
जब जब मुझे लगता है,
पुरे घर को सँभालने के चक्कर में,
तुम्हे पास से देखे काफी दिन हो गये हैं,
मजबूरन,सुबह ऑफिस जाते हुए ,
बुशर्ट के एक बटन को आहुति देनी पड़ती है,
तुम्हे मेरे पास लाने के लिए।
मैं बड़ी बेसब्री से इन्तजार करता हूँ,
उस आखरी टाँके का,
जिसके बाद तुम्हे अपने होंठो से
धागे को काटने के लिए
मेरे पास आना ही पड़ता है।
तुम जब जब मेरी आदतों पर
मुझे गुस्से से डांटती हो न,
और मैं हल्की सी हंसी लिए तुम्हारी,
आँखों में देखने लगता हूं।
तो तुम जान बूझ कर मेरी,
आँखों में देखती ही नहीं,
वो क्यों हम दोनो जानते हैं।
लिखना जरुरी नहीं समझता।
सुबह मैं लेट हो रहा होता हूँ,
लेट मैं होता हूँ,नाश्ता तुम्हारा टाइम पर
बन गया होता है,
मैं और जल्दबाज़ी करता हूँ,
नाश्ता छोड़ने की जिद्द करता हूँ,
तुम जब अपने हांथो से खिलाने के लिए पीछे
दौड़ती हो न,
ऐसा लगता है कि रोज लेट हो जाने
का मजा ही कुछ और है।
जब जब बेटी को तुम मेरे पास,
छोड़ कर काम मैं लग जाती हो,
और उसकी शैतानियां मुझे उस पर
गुस्सा होने को मजबूर कर देती है।
तब मुझे याद आता है वो दिन,
जब मैंने पहली बार उसे गोद में लिया था,
और वो एक टक मेरी और देख रही थी।
और मैं कब सब कुछ भूल जाता हूँ,
पता ही नहीं लगता है।
जब मैं शाम को तुमसे मिलता हूँ,
तो दिन भर की जुदाई के बाद वो,
मिलने का एहसास ही,
मुझमे ज़िन्दगी को जीने जोश पैदा,
कर देता है।
और मेरी थकान को ऊर्जा में बदल देता है।
बस ऐसा ही तुम्हारा और मेरा साथ,
पर जब तुम,मेरे कांधे पर सर
रख कर अपनी बाहें मेरी बाहों में डाल कर
साथ बैठती हो,
तो ऐसा लगता है,जैसे शादी को एक हफ्ता बाकी है।
और तुम मुझसे मिलने आयी हो।
और हम दोंनो कहीं बैठ कर सपनें बून रहें हैं।
जब कभी रात को हमारी अनबन हो जाती है,
तो मैं सोचता हूँ,कि तन्हा ही अच्छा था,
पर सुबह जब कभी,मैं कहीं अकेला बैठा होता हूँ,
तो ये सोचने से भी घबरा उठता हूँ कि,
कहीं तन्हा हो न जाऊं।
जब जब मुझे लगता है,
पुरे घर को सँभालने के चक्कर में,
तुम्हे पास से देखे काफी दिन हो गये हैं,
मजबूरन,सुबह ऑफिस जाते हुए ,
बुशर्ट के एक बटन को आहुति देनी पड़ती है,
तुम्हे मेरे पास लाने के लिए।
मैं बड़ी बेसब्री से इन्तजार करता हूँ,
उस आखरी टाँके का,
जिसके बाद तुम्हे अपने होंठो से
धागे को काटने के लिए
मेरे पास आना ही पड़ता है।
तुम जब जब मेरी आदतों पर
मुझे गुस्से से डांटती हो न,
और मैं हल्की सी हंसी लिए तुम्हारी,
आँखों में देखने लगता हूं।
तो तुम जान बूझ कर मेरी,
आँखों में देखती ही नहीं,
वो क्यों हम दोनो जानते हैं।
लिखना जरुरी नहीं समझता।
सुबह मैं लेट हो रहा होता हूँ,
लेट मैं होता हूँ,नाश्ता तुम्हारा टाइम पर
बन गया होता है,
मैं और जल्दबाज़ी करता हूँ,
नाश्ता छोड़ने की जिद्द करता हूँ,
तुम जब अपने हांथो से खिलाने के लिए पीछे
दौड़ती हो न,
ऐसा लगता है कि रोज लेट हो जाने
का मजा ही कुछ और है।
जब जब बेटी को तुम मेरे पास,
छोड़ कर काम मैं लग जाती हो,
और उसकी शैतानियां मुझे उस पर
गुस्सा होने को मजबूर कर देती है।
तब मुझे याद आता है वो दिन,
जब मैंने पहली बार उसे गोद में लिया था,
और वो एक टक मेरी और देख रही थी।
और मैं कब सब कुछ भूल जाता हूँ,
पता ही नहीं लगता है।
जब मैं शाम को तुमसे मिलता हूँ,
तो दिन भर की जुदाई के बाद वो,
मिलने का एहसास ही,
मुझमे ज़िन्दगी को जीने जोश पैदा,
कर देता है।
और मेरी थकान को ऊर्जा में बदल देता है।
बस ऐसा ही तुम्हारा और मेरा साथ,
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